करीब तीन हजार करोड़ मूल्य की जमीन पर बना पंजाब इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसिस पैसे-पैसे को मोहताज हो गया है। करोड़ों के इस खेल में पिम्स के हालात अब इस कदर बदतर हो चुके हैं कि जहां पहले हजार के आसपास रोजाना ओपीडी पहुंचती थी, वहां अब सन्नाटा पसरा हुआ था।
करोड़ों रुपये के इस खेल में राजनीतिज्ञों ने जेब से पैसा कम लगाया और मुनाफे की तरफ अधिक भागे, जिस कारण पिम्स की आर्थिक हालत खस्ता हो गई। अब हालात यह है कि पिम्स के चिकित्सक, लेक्चरर और पैरामेडिकल स्टाफ से लेकर तमाम इंप्लाइज हड़ताल पर हैं। चिकित्सकों को छह माह से वेतन नहीं मिला तो पैरा मेडिकल स्टाफ को चार माह से। अस्पताल का इंडोर खाली हो चुका है, नर्सें भी हड़ताल पर चल रही हैं।
पिम्स की मार्केट में कीमत ही इसकी सबसे बड़ी दुश्मन बन गई। पिम्स 56 एकड़ जमीन पर बना हुआ है, इस पर सरकार का केवल इंफ्रास्ट्रक्चर पर 130 करोड़ रुपये का खर्चा आया था।
2009 में शिअद ने करोड़ों रुपये के इस इंस्टीट्यूट को अपनी ही सरकार के मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा, एनआरआई चिकित्सकों के एक ग्रुप व शिअद को 131 करोड़ रुपये में लीज पर सौंप दिया। पिम्स के संचालन के लिए बनी सोसाइटी ने लीज को बैंक में गिरवी रखकर आगे 140 करोड़ रुपये का कर्ज ले लिया और अस्पताल को शुरू कर दिया।
पिम्स की तरफ से सफाई के लिए ठेका सनराइज कंपनी को दिया गया, जिसके तहत काम करने वाले सफाई मुलाजिमों ने पैसा न मिलने पर पिम्स में पहला प्रदर्शन किया। जिसको लेकर काफी बवाल मचा। पिम्स में खर्चा बढ़ता जा रहा था और कमाई कम होती जा रही थी।
पिम्स में 2011 में जब मेडिकल कॉलेज में दाखिले को हरी झंडी मिली तो संचालकों को कुछ राहत हुई लेकिन आर्थिक संकट काफी बढ़ चुका था। बैंक में पिम्स का कर्ज ब्याज अदा न होने के कारण बढ़ता ही जा रहा था। पैरा मेडिकल स्टाफ ने 2012 में हड़ताल की, जिसमें दफ्तरी स्टाफ भी शामिल हुआ। इसके साथ आपरेशन थियेटर मुलाजिम भी पगार न मिलने के कारण हड़ताल पर चले गए।
यहां सफाई सेवकों को सनराइज कंपनी ढंग से पगार नहीं दे रही थी, वहीं पिम्स प्रबंधक भी अपने स्टाफ को संतुष्ट नहीं कर पा रहे थे। 2013 में एमबीबीएस कर रहे विद्यार्थियों ने हॉस्टल में ढंग का खाना पीना और व्यवस्था ठीक न होने के कारण हड़ताल कर दी। 300 विद्यार्थी हड़ताल पर चले गए।
पिम्स का कामकाज देख रहे प्रबंधकों ने उस मामले को काफी मुश्किल से संभाला। पिम्स में मेडिकल कॉलेज के लिए 150 लेक्चरर थे, जिसमें से कई हालत खस्ता होते देखकर निकल गए, इसी कारण मेडिकल काउंसिल ने 2013 में एमबीबीएस में दाखिले के लिए मान्यता ही नहीं दी।
पिम्स में 11 दिसंबर को आखिरकार चिकित्सक भी हड़ताल पर चले गए, उनको पांच माह से वेतन नहीं मिला था। पिम्स में खर्चा डेढ़ करोड़ रुपये प्रति माह तक पहुंच चुका था लेकिन आमदनी काफी कम हो रही थी। पिम्स में पैसे की मैनेजमेंट बेहतर न होने के कारण आर्थिक हालात खराब होते गए।
चिकित्सकों के बाद पिम्स के 300 के करीब पैरामेडिकल और स्टाफ नर्सें और अन्य स्टाफ भी हड़ताल पर चला गया। ताजा स्थिति यह है कि पिम्स में चिकित्सकों को छह माह और पैरामेडिकल स्टाफ को चार माह से वेतन नहीं मिला है, ऊपर से बैंक का कर्ज दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जा रहा है।