लंदन की पैंटोविले जेल में 31 जुलाई, 1940 को ऊधम सिंह को फांसी देने के बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने शहीद की इच्छा को दरकिनार करते हुए उनका पार्थिव शरीर देने से साफ इंकार कर दिया था। अंग्रेजों को डर था कि पार्थिव शरीर ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत तथा हिंदुस्तान में आजादी की जंग को प्रचंड कर देगा। शहादत से 34 साल तथा आजादी से 27 साल बाद ऊधम सिंह के पार्थिव शरीर को देश में दो गज जमीन नसीब हुई थी।
शहादत के 6 दिन बाद शहीद के दोस्त शिव सिंह जौहल ने 6 अगस्त, 1940 को पैंटोविले जेल के गवर्नर को पत्र लिखा कि महरूम ऊधम सिंह का सामान गुरुद्वारा सिनक्लेयर रोड, लंदन को भेजने का कष्ट करें। ऐसी ऊधम सिंह की इच्छा थी। कमेटी का आग्रह है कि ऊधम सिंह का पार्थिव शरीर भी सौंपा जाए ताकि हिंदुस्तान में सिख धर्म के मुताबिक अंतिम संस्कार किया जा सके।
जेल गवर्नर ने उसी दिन पत्र के उत्तर में लिखा कि ऊधम सिंह की वस्तुएं आपको अलग लिफाफे में भेज दी गई हैं। मैं अस्थियों संबंधी निवेदन स्वीकार नहीं कर सकता। अंग्रेजों को अंदेशा था कि पार्थिव शरीर देने से उनके खिलाफ बगावत हो जाएगी। उक्त पत्र लेखक राकेश कुमार की पुस्तक महान गदरी शहीद ऊधम सिंह के पन्नों 340 व 341 पर प्रकाशित किए गए हैं।
साढ़े तीन दशकों के इंतजार के बाद शहीद का पार्थिव शरीर भारत लाया गया। 19 जुलाई, 1974 को शहीद की अस्थियां दिल्ली मंगवाई गईं और देश के अलग अलग हिस्सों में श्रद्धांजलि देने के बाद 31 जुलाई, 1974 को (शहादत के दिन) सुनाम के स्टेडियम में अंतिम संस्कार किया गया।