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सरकार काऊ सेस तो ले रही, पर लंपी पीड़ित मवेशियों की देखभाल नहीं कर रही

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जीरकपुर। संरक्षित पशुओं में लंपी बीमारी वैसे तो हर शहर में पशुओें और प्रशासन के लिए समस्या बनी हुई है। वहीं जीरकपुर में भी हर तरफ यहीं हालात हैं। शहर में एक गोशाला बनी हुई है, इसमें गायों की देखरेख तो की जा रही है। लेकिन जो संरक्षित गाय सड़कों पर घूम रही हैं उनकी हालात बहुत गंभीर है और इनकी देखभाल के लिए सरकार और स्थानीय प्रशासन कोई व्यवस्था नहीं कर पा रहा है। जबकि लोगों से काऊ सेस इकट्ठा किया जा रहा है, लेकिन इसका इस्तेमाल होता नजर नहीं आ रहा।
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हालांकि कुछ समाजसेवी संस्थाएं अपने तौर पर गायों को दवाइयां दे रही हैं और टीका लगा रही हैं। लेकिन प्रशासन की ओर से कोई डॉक्टर उनकी देखरेख के लिए उपस्थित नहीं है। कुछ लोगों का कहना है कि सरकार इन बेजुबान मवेशियों के नाम पर काऊ सेस तो वसूल रही है, लेकिन उनकी देखरेख के लिए कुछ नहीं कर रही है। काऊ सेस का पैसा कहां इस्तेमाल हो रहा है, कुछ नहीं पता। काऊ सेस के नाम पर पैसा होने के बावजूद पशुओं को रखने के लिए सरकार द्वारा कोई शेल्टर हाउस नहीं बनाया गया और उनके इलाज के लिए उचित प्रबंध नहीं हैं। जबकि पंजाब देश का पहला ऐसा राज्य था, जिसने काऊ सेस के रूप में लोगों से पैसा लेना शुरू किया था उस समय सरकार की तरफ से दलील दी गई थी कि संरक्षित पशुओं की वजह से सड़क पर हादसे होते हैं। काऊ सेस से जमा होने वाले पैसे से संरक्षित पशुओं की देखभाल और रखरखाव किया जाएगा। लेकिन बावजूद इसके लंपी से बीमार गाय सड़कों पर घूम रही हैं। वहीं कुछ समाज सेवी संस्थाओं ओर लोगों का कहना है कि हम यह जिम्मेदारी उठाने के लिए तैयार हैं, लेकिन सरकार हमारा साथ तो दे। वही स्थानीय लोगों की ओर से एक ओर गोशाला बनाने की मांग की जा रही है।
इन चीजों पर लिया जाता है काऊ सेस
2016 में पंजाब में कांग्रेस की सरकार के समय निकाय विभाग ने नोटिफिकेशन जारी किया था। नगर काउंसिलों और नगर निगमों को अलग-अलग कैटेगरी में बांटकर काऊ सेस लगाया गया था। इसके आधार पर अंग्रेजी शराब की बोतल पर 10 रुपये और देसी शराब की बोतल पर 5 रुपये के हिसाब से, सीमेंट के प्रति बैग पर 1 रुपये, बिजली के बिल पर प्रति यूनिट 2 पैसा, नई कार खरीदने पर 1000 रुपये, टू व्हीलर पर 200, एसी मैरिज पैलेस में बुकिंग पर 1000, नॉन एसी हाल की बुकिंग के लिए 500 रुपये आदि पर काऊ सेस लगाया गया था और सरकारोें ने काऊ सेस लगाकर लोगों से पैसा वसूल तो कर लिया है, लेकिन यह कहां खर्च हो रहा है, यह कोई नहीं जानता। जो एक चिंता का विषय है, लोगों की मांग है कि इसकी जांच होनी चाहिए।
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सड़कों पर घूमते संरक्षित पशुओें की वजह से हो रहे हादसे
स्थानीय समाज सेवी संस्था बजरंग दल और हिंदू तख्त के कार्यकर्ताओं का कहना है कि काऊ सेस लेने के बावजूद गाय सड़कों पर घूम रही हैं और हादसों में गाय मर भी रही हैं, जो बहुत ही अफसोस की बात है, क्योंकि खास तौर पर काऊ सेस गायों की देखरेख के लिए ही एकत्रित किया जाता है, लेकिन इस काम पर पैसा खर्च नहीं हो रहा है। उन्होंने कहा कि शहर में केवल एक गोशाला है, एक ओर बननी चाहिए, हम सेवा करने के लिए तैयार हैं। अगस्त में पंचकूला बैरियर पर सड़क हादसों में दो गायों की मौत हो गई थी। कब तक ऐसा ही होता रहेगा। अगर सरकार ने जल्द इस ओर ध्यान नहीं दिया तो वह अपनी संस्था की ओर से कोई ठोस कदम उठाएंगे।
काऊ सेस ले रहे, देखरेख भी करें
सरकार काऊ सेस ले रही है तो यह प्रशासन की जिम्मेदारी बनती है कि वह सड़कों पर घूम रहे संरक्षित पशुओें की देखरेख करे। उनके लिए शेल्टर बनाए, बीमारी के दौरान उनका सही ढंग से इलाज हो। काऊ सेस किसलिए लिया जा रहा है। हम निजी तौर पर गायों को दवाइयां और इंजेक्शन दे रहे हैं, जबकि यह जिम्मेदारी प्रशासन की ही है। -अशोक तिवारी, राष्ट्रीय प्रवक्ता हिंदू तख्त जीरकपुर।
एक ओर गोशाला बननी चाहिए
शहर में केवल एक ही गोशाला है, जहां पशुओें की देखरेख हो रही है, बहुत अच्छी बात है। लेकिन जो संरक्षित पशु सड़कों पर घूम रहे हैं, उनका क्या कसूर है। काऊ सेस तो उनके नाम पर भी लिया जा रहा है। अगर प्रशासन सच में ही सभी गायों रक्षा करना चाहता है तो एक गोशाला ओर बनानी चाहिए। देखरेख करने के लिए हमारे साथ बहुत से हिंदू संगठन जुड़े हुए हैं, जो इसकी जिम्मेदारी के लिए तैयार हैं। -जगतगुरु पंचा नंद गिरी, कमाख्या पीठाधीश्वर जीरकपुर।
प्रशासन को साथ देना चाहिए
लंपी बीमारी के कारण गायों की हालात बहुत गंभीर है, हमारी संस्था द्वारा जितना बन पाता है, इस मुश्किल दौर में हम सेवा कर रहे हैं। दवाई भी दी जा रही है। यदि प्रशासन का साथ मिले तो इन बेजुबान गायों को काफी हद तक बचाया जा सकता है। यह बीमारी बहुत भयानक है, कुछ ही दिनों में गाय की हालत खराब हो जाती है। इसके बाद उसे बचाने के लिए कोई विकल्प नहीं बचता। -मनीष दुबे, महा सचिव हिंदू तख्त जीरकपुर।
बीमार गायोें को अलग शेल्टर में रखें, बाकी सुरक्षित रहेेंगी
प्रशासन को इस ओर ध्यान देना चाहिए। डॉक्टर दवाई ओर उन्हें अलग रखने के लिए स्थायी न सही, अस्थायी इंतजाम तो करना चाहिए जिससे बाकी गायों को यह बीमारी न हो। यह ऐसी बीमारी है जो एक पशु से दूसरे में फैलती है, तो शहर में घूम रहीं संरक्षित गायों में भी यह बीमारी फैलने का खतरा है। प्रशासन को जल्द से जल्द इसका कोई इंतजाम करना चाहिए। -साहिल बेदी, स्थानीय निवासी।
कोट्स
डीसी मोहाली के आदेशों के बाद संरक्षित गायों के लिए शेल्टर होम बनाने के आदेश दे दिए गए हैं। इसकी जिम्मेदारी नगर काउंसिल की है। फिलहाल हमने जीरकपुर में दो डॉक्टर लगाए हुए हैं जो गोशाला और सड़कों पर घूम रही गायों की जांच कर रहे हैं और दवाई भी दे रहे हैं।
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-डॉ. शिवकांत गुप्ता, सीनियर वेटरनरी ऑफिसर डेराबस्सी।
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