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बिना किसी कोचिंग के प्रकृति ने आईआईटी मुंबई में पाया दाखिला, बहन ने भी शुरू की मेहनत

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मोहाली। आईआईटी मुंबई में दाखिला पाना किसी चुनौती से कम नहीं और इस चुनौती को कैसे अपने मुकाम में तब्दील किया जाता है, इसका उदाहरण जीरकपुर के लोहगढ़ की प्रकृति मेहता ने पेश किया है। जी हां प्रकृति ने अपनी मेहनत की बदौलत 10वीं और 12वीं क्लास के अंदर फर्स्ट पॉजिशिन हासिल की और अच्छे नंबरों की मदद से आईआईटी मुंबई में दाखिला पाकर अपने पिता गुलशन मेहता के सपने को सच कर दिखाया। इसमें खास बात यह रही कि प्रकृति ने आईआईटी में प्रवेश के लिए कोचिंग से ज्यादा महत्व घर में रहकर पढ़ाई करने को दिया।
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प्रकृति कहती हैं कि आईआईटी में पढ़कर डिग्री हासिल करने का सपना पूरा करना किसी चुनौती से कम नहीं था, लेकिन इस चुनौती से पहले मुझे अपनी छोटी बहन और परिजनों के साथ घर के कामों में हाथ बंटाना भी जरूरी था। क्योंकि मेरी मम्मी बैंक में चीफ मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं और मैं जब 9वीं कक्षा में थी, तब अचानक मेरी मम्मी का ट्रांसफर जीरकपुर से लुधियाना हो गया था। इस से पहले उनकी मदद से मुझे खाने-पीने को लेकर कभी फिक्र नहीं हुई थी और जब उनका ट्रांसफर हो गया तो उन्हें सुबह जल्दी घर से निकलना पड़ता था। जबकि मेरे पिता पंजाब एवं हरियाणा कोर्ट में एडवोकेट हैं, जिनको अपने काम के सिलसिले में अकसर जल्द ही घर से निकलना होता है और ऐसे में मेरे ऊपर पढ़ाई के साथ-साथ घर को संभालने की जिम्मेदारी थी थी। संवाद
कोचिंग न लेकर खुद पर किया भरोसा
प्रकृति ने बताया कि मम्मी के ट्रांसफर के बाद अपनी पढ़ाई के साथ-साथ मुझे अपनी छोटी बहन को पढ़ाने की जिम्मेदारी भी मेरे कंधों पर आ गई थी और किसी जिम्मेदारी से कभी भागने की कोशिश नहीं की। इसलिए जब मैं अपनी पढ़ाई करती थी तो अपनी बहन को साथ बैठा लेती थी और छोटी बहन होने के नाते सभी के लिए खाना बनाना पड़ता था। ऐसा नहीं कि मेरी बहन ने पढ़ने को लेकर कभी परेशान किया हो, बल्कि मेरी पढ़ाई के दौरान चुपचाप बैठकर मुझे सुना करती थी। पहले मुझे मन के अंदर पढ़ने की आदत थी, लेकिन ऊंची आवाज में मुझे जल्द याद होता है तो ऊंची आवाज में पढ़ाई करते हुए बहन बड़े ध्यानपूर्वक सुनती रहती थी। आमतौर पर आईआईटी के लिए कोचिंग सेंटर्स की मदद लेते हैं, लेकिन मैंने कोचिंग के बजाए खुद को घर में कैद करके पढ़ाई की और जेईई एडवांस टेस्ट दिया, जिसमें रेंक पाने के बाद आईआईटी मुंबई में दाखिला हासिल हुआ।
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11 महीने पापा के दफ्तर में की पढ़ाई
जेईई एडवांस की तैयारी के लिए प्रकृति ने अपने घर की तीसरी मंजिल पर स्थित पिता के दफ्तर को अपना स्टडी रूम बना लिया। पूरा दिन पापा के दफ्तर में रहकर पढ़ाई की और दफ्तर में ही रात को सो जाती थी। आमतौर पर लोग पढ़ाई से बोर होकर म्यूजिक सुनते हैं, लेकिन प्रकृति ने म्यूजिक सुनने के बजाए अपनी स्टडी से संबंधी नोटिस को ऑडियो विजुअल के जरिये सुनकर पढ़ाई की।
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