पेक की बात करें तो इसमें कई खास बातें हैं, जिनमें से एक परिसर में सुशोभित दो रूसी विमान हैं। पेक के मुख्य गेट से अंदर आते ही बाईं तरफ एमआई-8 रूसी हेलीकॉप्टर है, जिसे सेना ने 2004 में संस्थान को दिया। दो इंजन वाले एमआई-8 का एक इंजन उसी में है। दूसरा एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग में रखा गया है। 1971 में शामिल हुए एमआई-8 का प्रयोग अभी भी सेना की ओर से किया जा रहा है। मिग-21 एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग में विराजमान है, जिसे 60 के दशक में प्रयोग में लाया गया और भारत-पाक की तीनों जंग में इसका प्रयोग हुआ। इसके अलावा पेक के पास के विभिन्न विभागों में नई-पुरानी मशीनों का संगम है।
मैकेनिकल इंजीनियरिंग में इंग्लैंड से 1947 में आयातित स्टीम इंजन है, जहां छात्रों को स्टीम के जरिये बिजली उत्पन्न करने की प्रक्रिया से रूबरू किया जाता है। पुरानी मशीनों के साथ विभाग में पिक एंड प्लेस रोबोट के प्रोटोटाइप मॉडल, 3डी प्रिंटर आदि आधुनिक मशीनें हैं। पेक ने विश्व युद्ध-2 में प्रयोग हुए स्पिट फायर एयरक्राफ्ट और ऑस्टर एगलेट एयरक्राफ्ट को नई दिल्ली स्थित एयरफोर्स म्यूजियम के लिए दे दिया और बदले में मिग-21 को लिया।
पेक का एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग खास :
पेक के एयरोस्पेस इंजीनियरिंग विभाग अध्यक्ष प्रो. राकेश कुमार ने बताया यह देश का पहला संस्थान है, जहां 1962 में एयरोस्पेस इंजीनियरिंग में बीटेक शुरू की। हालांकि उस समय इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस बंगलूरू द्वारा भी कोर्स शुरू किया गया था लेकिन बाद में उसे बंद कर दिया। कोर्स शुरू होने के तहत पेक के वायुसेना से शुरू से बेहतर संपर्क रहे। 1962 में कोर्स शुरू हुआ और 1965 में पहले बैच के पासआउट सभी 17 छात्रों की भर्ती भारतीय वायु सेना में हुई। देश को पहले एयरोस्पेस इंजीनियर देने में पेक का योगदान है।