मोहाली। कोरोना महामारी से जूझ रही इंडस्ट्री को पटरी पर लाने के लिए भले ही 20 लाख रुपये करोड़ के भारी भरकम पैकेज का ऐलान किया गया है। फिर भी सवाल बना हुआ है कि इंडस्ट्री कोरोना के उस पार खड़ी चुनौतियों से कैसे निपटेगी, केंद्र की योजनाएं कितनी कारगर होंगी।
क्योंकि इंडस्ट्री पर पहला प्रभाव राज्य सरकार की नीतियों और स्थानीय प्रशासन का पड़ता है। कामगारों की कमी, सप्लाई चेन की समस्या, स्किल्ड लेबर का अभाव और जुगाड़ को छोड़ स्थाई गुणवत्ता की जरूरत ऐसी चुनौतियां हैं, जिनसे निपटने के लिए विस्तृत कार्यक्रम की जरूरत है, लेकिन सवाल ये है कि यह कार्यक्रम कौन बनाएगा, बनाने वालों को क्या जमीनी हकीकत पता है?
मोहाली में करीब 13 हजार इंडस्ट्रीज की यूनिट हैं। जिनमें से अधिकांश यहां की बड़ी ट्रैक्टर और रेलवे पार्ट इंडस्ट्री पर निर्भर हैं। फार्मा इंडस्ट्री का रॉ मैटीरियल विदेशों पर निर्भर है, तो आईटी इंडस्ट्री के सामने इंफ्रास्ट्रक्चर, गुणवत्ता और स्किल्ड इम्पलायमेंट जैसी समस्याएं हैं। कोरोना काल में कामगारों का पलायन मौजूदा समय की सबसे बड़ी समस्या है। बहुत से उद्योगपति तो अपने निजी वाहन भेज कर जैसे तैसे कामगारों को वापिस बुला रहे हैं। उस पर भी डरे हुए कामगार सहजता से वापिस लौटने को तैयार नहीं हैं। पंजाब के युवा खुद पलायन का शिकार हैं, लिहाजा स्थानीय स्तर पर कामगारों का मिलना मुश्किल हो चला है।
लॉकडाउन के बाद अनलॉकिंग के दौर में भी राज्यों की अपनी-अपनी नीतियां सप्लाई चेन को प्रभावित कर रही हैं। ट्रांस्पोर्टेशन की समस्या के चलते रॉ मैटीरियल की आपूर्ति और तैयार माल की सप्लाई बाधित है। जिसका सीधा असर उत्पादन पर पड़ रहा है। इन मौजूदा समस्याओं के साथ ही स्किल्ड लेबर का अभाव इंडस्ट्री के सामने एक स्थाई समस्या बन चुकी है। लिहाजा काम में माहिर हो चुके पुराने कामगारों पर इंडस्ट्री की निर्भरता बढ़ गई है। पंजाब सरकार भले ही युवाओं के स्किल डेवलपमेंट को लेकर कार्यक्रम चला रही है, लेकिन उसका फायदा जमीनी स्तर पर इंडस्ट्री को नहीं मिल पा रहा। इसकी बड़ी वजह है ऐसे प्रोग्राम तैयार करने वाली अफसरशाही का जमीनी हकीकत से दूर होना।
क्या स्थितियां सामान्य होने पर वापिस लौटेंगे कामगार
लॉकडाउन में फैक्ट्रियां बंद रहीं। इस आपदा में कामगारों ने घर वापसी की राह पकड़ी। बड़ी समस्या यह है कि क्या स्थितियां सामान्य होने पर कामगार वापिस लौटेंगे। अगर वे समयबद्ध तरीके से वापस नहीं लौटते हैं तो यह निश्चित है कि उत्पादन क्षमता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। स्थानीय स्तर पर स्किल्ड लेबर की पहले से ही कमी है। राज्य सरकार ने स्किल डेवलपमेंट कार्यक्रम शुरू तो किया है, लेकिन इंडस्ट्री को इसका वैसा सीधा फायदा नहीं मिल पा रहा है, जैसा कि मिलना चाहिए। शार्ट टर्म स्किल डेवलपमेंट उतना प्रभावी नहीं हो सकता। इसकी शुरूआत स्कूली स्तर से ही होनी चाहिए। नई शिक्षा नीति से उम्मीद है, लेकिन नतीजे आने में लंबा समय लगेगा, तब तक यह समस्याएं बरकरार रहेंगी।
- राजीव गुप्ता, एमडी, सेनर्जी मैटल्स प्रा. लि.
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केंद्र का राहत पैकेज अधिकांश अस्पष्ट
- माइक्रो, स्मॉल और मिडिल इंडस्ट्री यानि एमएसएमई सेक्टर पहले से ही आर्थिक तनाव के दौर से गुजर रहा था। कोविड-19 ने उसकी आर्थिक स्थिति को डांवाडोल करने का काम किया है। चूंकि इन फैक्ट्रियों में काम करने वाले कामगार अपने घर लौट चुके हैं, डिमांड न के बराबर है। पहले से लिए लोन की किस्तें बढ़ती जा रही हैं तो ऐसी स्थिति में अपने आप को बचा कर रखना बड़ी चुनौती बन गई है। जब हम आत्मनिर्भर भारत की बात करते हैं तो यह सेक्टर विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि जीडीपी में इसका 29 फीसदी योगदान है। केंद्र ने जो राहत पैकेज दिया है, वह अधिकांश अस्पष्ट है। राज्य सरकार ने स्थानीय इंडस्ट्री को बूस्ट करने और आपदा से बचाने की कोई पहल नहीं की, बल्कि बोझ डालना शुरू कर दिया है।
- संजीव गर्ग, एमडी, आरजी फारजिंस प्रा. लि.
सरकार का सिर्फ लोन देकर खुद को बचाने का ऑफर मिला
ब्रिटेन की सरकार टैक्स रियायतों, कारोबारों को सस्ता कर्ज देकर तरह-तरह के अनुदान सहित 400 अरब डॉलर का पैकेज लाई। बैंक ऑफ इंग्लैंड ब्याज दरें घटाकर बाजार में पूंजी झोंक रहा है। इसके विपरीत हमें यहां लोन देकर खुद को बचाने का ऑफर सरकार ने दिया है। इस लोन का आधार तक स्पष्ट नहीं है। बैकों की ब्याज दरें अलग-अलग हैं। इनमें कोई राहत नहीं मिली। कोरोना के मारे कामगारों, छोटे कारोबारियों, नौकरियां गंवाने वालों को सरकार ने कोई सीधी मदद नहीं दी। पीएफ से मिल रही रियायतों के लाभ केवल 15-16 फीसदी प्रतिष्ठानों को मिलेंगे। आत्मनिर्भर भारत के लिए तकनीक व उत्पादन का गुणवत्ता परक होना जरूरी है। पहले से ही आर्थिक सुस्त के शिकार एमएसएमई सेक्टर बूस्ट देने की जरूरत है।
- राजीव स्याल, प्रोपराइटर, स्याल एंड एसोसिएट्स
आत्मनिर्भता के लिए विकेंद्रीकरण मॉडल की जरूरत
मोहाली में छोटी फैक्ट्रियों और लघु उद्योगों की संख्या अधिक है। जिनके सामने कोरोना काल में कैश फ्लो यानि नकदी की समस्या खड़ी हो गई है। ऐसी स्थिति में एमएसएमई सेक्टर के सामने बैंकों से मनमानी दरों पर लोन लेने के सिवा कोई चारा नहीं बचता है। जिससे यह सेक्टर कर्ज जाल में फंसेगा। आत्मनिर्भर भारत अभियान को अगर जमीन पर उतारना है तो इसके लिए डीसेंट्रेलाइजेशन यानि विकेंद्रीकरण मॉडल की जरूरत है। जिसमें उत्पादन, वितरण और शासन तीनों का विकेंद्रीकरण करके रोजमर्रा की जरुरतों के लिए स्थानीय स्तर पर आत्मनिर्भर बनाना होगा। जिससे आसपास के गांवों को रोजगार से जोड़ा जा सके। कोरोना काल में पलायन करके जो लोग वापस जा चुके हैं उनमें से बहुत से शायद की वापस आएं।
- हरजिंदर सिंह चीमा, एमडी, चीमा बॉयलर्स