गांव स्वाड़ा में फर्जी टी-20 क्रिकेट मैच करवाकर उसे श्री लंका में होता बताकर करोड़ों का सट्टा लगाने के आरोप में पकड़े गए रविंदर सिंह डंडीवाल पर पुलिस ने शिकंजा कस दिया है। सूत्रों के मुताबिक पुलिस जांच में सामने आया है कि शातिर डंडीवाल फर्जी लीग में उन खिलाड़ियों को ही चुनता था। जो कि जरूरतमंद और प्रतिभावान होने के बावजूद क्रिकेट लाइन में मुकाम हासिल नहीं कर पाते थे। लेकिन उनमें प्रतिभा थी।
वह हर स्टेज में मैच को बदलने का दम रखते हों। वहीं, इस लाइन से जुड़े होते थे। क्योंकि मैच में हर बाल और शॉट फिक्स रहता था। इतना ही नहीं वह उक्त खिलाड़ियों को प्रति मैच के हिसाब से पेेमेंट करता था, हालांकि खिलाड़ियों को कभी इस बात का अहसास नहीं होने देता था कि वह फर्जी हैं। इतना ही नहीं वह हमेशा अपने बारे में किसी को कुछ बताता नहीं था। बड़े स्पोर्ट्स कारोबारी की तरह खुद को पेश करता था।
सभी खिलाड़ियों का रिकॉर्ड पुलिस ने तैयार कर लिया है। दूसरी तरफ पुलिस यह पड़ताल करने में लग गई है कि आखिर अब तक कितनेे पैसे डंडीवाल ने कमाए हैं और कहां निवेश किए हैं। वहीं, यह भी पता लगाया जा रहा है कि इन मैचों में हवाला का कौन सा तरीका इस्तेमाल किया गया है, जिससे इस पूरी कहानी से पर्दा उठाया जा सके। मोहाली पुलिस के लिए भी यह अपनी तरह का पहला केस हैं। ऐसे में पुलिस हर चीज को गंभीरता से ले रही है और साथ ही कई विशेषज्ञों को पुलिस साथ लेकर चल रही है।
छह साल में बनाई प्रॉपर्टी हो सकती है जब्त
मिली जानकारी के मुताबिक पुलिस रविंदर सिंह डंडीवाल की संपत्ति का पता लगाने में जुटी है और इसके लिए राजस्थान पुलिस से भी संपर्क साधा गया है। पता लगाया जा रहा है कि उसके नाम पर कितनी जमीन है। पिछले 6 साल में उसने कितनी प्रॉपर्टी जुटाई है इसका भी खाका तैयार किया जा रहा है। हालांकि पता चला है कि वह मोहाली और जीरकपुर में रहा है और अब पिछले पांच साल से लगातार विदेश दौरे पर ही रहा है।
भारत में इस चीज का फायदा उठाते हैं आरोपी
भले ही मोहाली मैच फिक्सिंग के किंगपिन रविंदर सिंह डंडीवाल को काबू कर लिया गया है। लेकिन कानूनी विशेषज्ञों की मानें तो भारत में मैच फिक्सिंग को लेकर कोई कानून नहीं है और इसी का आरोपी पूरा फायदा उठाते हैं। एडवोकेट प्रीतपाल सिंह बासी का कहना है कि 2018 लॉ कमीशन के जस्टिस बीएस चौहान ने एक रिपोर्ट दी थी। जिसमें कहा था कि मैच फिक्सिंग में सख्त सजा दी जाए और आरोपियों को जेल भेजा जाए।
2001 में पहली बार मैच फिक्सिंग का मामला सामने आया था, जब सीबीआई ने मैच फिक्सिंग की रिपोर्ट दी थी तो उसमें सिर्फ खिलाड़ियों का जिक्र किया था। उसमें यहां तक कहा गया था कि सट्टेबाजी को कानूनी मान्यता दे दी जाए, ताकि इससे सट्टेबाजों की पहचान हो जाए। 2013 में प्रोवेंशन ऑफ स्पोर्टिंग फ्रॉड बिल पार्लियामेंट में पेश हुआ था। इसमें काफी कठोर कानून बनाने पर जोर दिया गया था, लेकिन यह मामला अभी अधर में है।