-नलबंदी के विफल होने के बारे में सूचित न करने को हाईकोर्ट ने माना लापरवाही
-पंजाब सरकार की अपील को हाईकोर्ट ने किया सिरे से खारिज
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अमर उजाला ब्यूरो
चंडीगढ़। पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने एक महिला को असफल नलबंदी प्रक्रिया के लिए दिए गए 20 हजार रुपये के मुआवजे के आदेश को बरकरार रखा है। न्यायालय ने कहा कि उसे इसकी विफलता की संभावना के बारे में सूचित नहीं किया गया था जिस कारण अंततः उसके छठे बच्चे का जन्म हुआ और ऐसे में वह मुआवजे की हकदार है।
जस्टिस हरप्रीत कौर जीवन ने कहा कि महिला की सहमति उक्त ऑपरेशन के फायदे और नुकसान के बारे में जानकारी देने के बाद प्राप्त की जानी चाहिए थी और उसे स्पष्ट रूप से बताया जाना चाहिए था कि उक्त ऑपरेशन के विफल होने की संभावना 0.3% तक है। कोर्ट ने कहा कि विज्ञापन यह कहकर जनता को ऑपरेशन के लिए आकर्षित करने के लिए प्रकाशित किया गया था कि ऐसे ऑपरेशन सफल होते हैं और गर्भधारण की कोई संभावना नहीं होती है। यह दर्शाता है कि महिला से प्राप्त सहमति केवल दिखावा थी। पंजाब सरकार और पंजाब स्वास्थ्य निदेशक ने सिविल जज के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसके तहत महिला को 1999 में उसके बच्चे के भरण-पोषण के लिए 20 हजार रुपये देने का निर्देश दिया गया था।
महिला ने पंजाब सरकार के खिलाफ 2 लाख रुपये के हर्जाने और मुआवजे की वसूली के लिए मुकदमा दायर किया था क्योंकि उनकी कथित लापरवाही के कारण ऑपरेशन अप्रभावी और असफल हो गया। महिला ने कहा था कि उसके पांच बच्चे पहले से मौजूद थे। वह नलबंदी के लिए तैयार हुई थी क्योंकि अधिकारियों ने आकर्षक इनाम की पेशकश की और गारंटी भी दी कि ऑपरेशन के बाद भविष्य में गर्भधारण की कोई संभावना नहीं होगी। उसे 3 जुलाई, 1990 को पता चला कि वादी गर्भवती थी और उसने 17 दिसंबर, 1990 को एक लड़की को जन्म दिया। महिला ने प्रसव से संबंधित खर्च उठाया और बच्चे के पालन-पोषण का खर्च वहन कर रही है।