होशियारपुर कार्बन उद्योग की अपनी अनूठी पहचान दुनिया भर में है। भारतीय कार्बन बाजार में 80 प्रतिशत हिस्सेदारी वाला होशियारपुर का यह उद्योग देश के लिए विदेशी मुद्रा की अत्यधिक बचत भी करता है।
राज्य में कुछ समय पहले बिजली की कीमतों में भारी वृद्धि, उद्योगों पर लगने वाले लंबे-लंबे पावर कटों और गर्मी के मौसम में इंडस्ट्री पर थोपे जाने वाले पावर हॉवीडेज की वजह से भी उद्योगपति पहले ही परेशान थे। ऊपर से कच्चे माल की कमी और इंस्पेक्टरी राज के बाद पहाड़ी राज्यों को मिलने वाले पैकेज के चलते भारी करों की मार झेल रहे इस उद्योग से जुड़े उद्योगपतियों ने पंजाब से पलायन के बारे में सोचना शुरू कर दिया है।
हिमाचल में यहां के मुकाबले कहीं सस्ती बिजली और साथ ही औद्योगिक विकास पैकेज से मिलने वाले लाभ की वजह से यह उद्योग चलाने वाले लोग अब यहीं जूझने के बजाय हिमाचल जाने के दूसरे विकल्प की तलाश करने लगे हैं।
हिमाचल का नव-विकसित औद्योगिक क्षेत्र गगरेट यहां से 19 किलोमीटर दूर है और उसके कुछ ही किलोमीटर पर अंब का औद्योगिक क्षेत्र भी है। कार्बन उद्योग से जुड़े लोगों का कहना है कि अगर मौजूदा हालात में सरकार ने उनकी मदद न की तो उनके पास एक ही विकल्प बचेगा और वह है हिमाचल प्रदेश में उद्योग स्थानांतरण।
उद्योगपतियों का तर्क है कि पर्यावरण और विभिन्न विभागों के फंदे के चलते कच्चे माल की कमी, सरकारी समर्थन का अभाव और इंस्पेक्टरी राज के बोझ तले उद्योग मरने के कगार पर पहले से ही था। अब बिजली की अत्याधिक महंगी कीमतों व करों के बोझ ने उनकी कमर तोड़ कर रख दी है। उद्योगपतियों का कहना है कि सरकार की ओर से प्रोत्साहन के बजाय नकारात्मक रवैये ने उन्हें हिमाचल प्रदेश के करीबी इलाकों या गुजरात की ओर पलायन को विचार करने पर विवश कर दिया है।
बिजली की कीमतों में बढ़ोतरी से उद्योगपति परेशान
कार्बन उद्योग के लिए विद्युत सबसे महत्वपूर्ण आवश्यकता है। कुछ साल पहले जब इस उद्योग की यहां स्थापना हुई थी तो इस उद्योग का प्रमुख कच्चा माल अच्छा कोयला यहां बहुतायत से उपलब्ध था और कोई बिजली की कमी भी नहीं थी। इससे पहले तक काफी विदेशी मुद्रा एक्टिवेटेड कार्बन के आयात पर खर्च होती थी और इस उद्योग की होशियारपुर में स्थापना के बाद यह खर्च लगभग शून्य हो गया।
इस तरह विदेशी मुद्रा की बड़ी रकम की बचत हुई। लेकिन सख्त प्रदूषण नियंत्रण उपायों के कार्यान्वयन के साथ लकड़ी के कोयले की उपलब्धता कम हुई है। वर्तमान में कोयला, अब गुजरात राजस्थान और हिमाचल से आता है। बिजली की कीमतों में भारी बढ़ोतरी से उद्योग मालिक परेशान हैं। कच्चे माल की प्रोसेसिंग से लेकर उसकी ग्राइंडिंग, मिलिंग और अंतिम उत्पाद तैयार होने तक की सारी प्रक्रिया बिजली पर निर्भर है।
सरकार का नकारात्मक रुख असहनीय : जिंपा
कार्बन उद्योग एसोसिएशन के उपाध्यक्ष ब्रह्म शंकर जिंपा का कहना है कि उद्योगों पर हर साल लागू की जाती बिजली कटौती और करोड़ों का राजस्व देने के बावजूद सरकार का नकारात्मक रुख असहनीय है और इसके चलते उनके लिए यहां संचालन जारी रखना मुश्किल हो गया है। न तो लकड़ी का कोयला यहां आसानी से उपलब्ध है और न ही बिजली, तो फिर वह उद्योग यहां चलाएं भी तो क्यों और कैसे। बेहतर है कि हिमाचल शिफ्ट हो जाएं जहां बिजली आसानी से बिना कटौती उपलब्ध भी है। वह भी काफी सस्ती दरों पर साथ ही प्रोत्साहन पैकेज का लाभ भी मिलता है।