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पंथक सीट कहे जाने वाली रायकोट के पंथक परिवार अलग अलग राजनीति पर

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हलवारा (लुधियाना)। पंजाब मे टकसाली अकालियों का गढ़ और पंथक हलके से विख्यात विधानसभा सीट रायकोट मे अकाली दल की रीढ़ कहे जाने वाले तलवंडी परिवार के राजनीतिक रास्ते अलग हो गए हैं। आजादी के बाद से चुनाव मे ये पहली बार हो रहा है कि तलवंडी परिवार के सदस्य दो अलग राजनीतिक गठजोड़ के प्रत्याशियों के लिए प्रचार कर वोट मांग रहे हैं। अकाली राजनीतिक के स्तंभ लोह पुरुष की उपाधि से विभूषित मरहूम जत्थेदार जगदेव सिंह तलवंडी के बड़े बेटे जत्थेदार रंजीत सिंह तलवंडी अकाली दल बादल को अलविदा कहकर अकाली दल संयुक्त के सेक्रेटरी जनरल बन गए है।
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वो भाजपा गठजोड़ के प्रत्याशी गुरपाल सिंह गोल्डी के लिए चुनाव प्रचार कर रहे हैं। उनके छोटे भाई जत्थेदार जगजीत सिंह तलवंडी जो रायकोट से एसजीपीसी सदस्य हैं वो अकाली दल बसपा गठजोड़ के प्रत्याशी जत्थेदार बलविंदर सिंह संधु के प्रचार की कमान संभाले हुए हैं। दोनों भाई का हलका रायकोट में जबरदस्त प्रभाव है। उनकी बहन हरजीत कौर सिद्धू (तलवंडी ) अकाली दल संयुक्त के स्त्री अकाली दल की प्रधान हैं। वो भी आने वाले दिनों मे भाजपा गठजोड़ के प्रत्याशी गुरपाल सिंह गोल्डी के लिए आ रही हैं।
जत्थेदार रंजीत सिंह तलवंडी रायकोट से 2002 में अकाली दल से विधायक चुने गए थे। वर्ष 2012 मे रायकोट सीट एससी रिजर्व होने के बाद उन्हें अकाली दल ने खन्ना सीट का इंचार्ज बना दिया गया था। वर्ष 2020 में वह अकाली दल संयुक्त मे शामिल हो गए और उन्हें पार्टी ने सेक्रेटरी जनरल बना दिया। जिसके बाद उनकी बहन हरजीत कौर सिद्धू तलवंडी अकाली दल संयुक्त मे शामिल हो गई। उन्हें पार्टी ने स्त्री अकाली दल का प्रधान बना दिया है। जत्थेदार जगजीत सिंह तलवंडी लगातार रायकोट सीट से एसजीपीसी सदस्य बनते आ रहे हैं। आज भी हैं और बादल परिवार के करीबी बने हुए हैं। दोनों तलवंडी भाई की राजनीतिक राहें अलग होने से जहां पुराने टकसाली अकाली और युवा कार्यकर्ता निराशा में हैं। उन्हें समझ नहीं आ रही है कि दोनों में किस पार्टी और किस भाई का साथ दें। रायकोट के कई सीनियर अकाली नेताओं और कार्यकर्ताओं ने चुप्पी साध ली और चुनाव प्रचार से दूरी बनाकर घर बैठ गए हैं।
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एक समय था जब पंजाब की राजनीति में अकाली दल के तीन दिग्गज नेता जत्थेदार जगदेव सिंह तलवंडी, जत्थेदार गुरचरण सिंह टोहड़ा और प्रकाश सिंह बादल की तूती बोलती थी। इन्हें बादल टोहड़ा और तलवंडी की तिगड़ी के तौर पर जो ख्याति प्राप्त हुई वो आज तक किसी को नहीं मिली। जत्थेदार जगदेव सिंह तलवंडी अकाली राजनीति एक मात्र शख्सियत हैं जो एसजीपीसी और अकाली दल के प्रधान रह चुके हैं। रायकोट के गांव तलवंडी राय के टकसाली अकाली छांगा सिंह के बेटे लौह पुरुष जत्थेदार जगदेव सिंह तलवंडी रायकोट से अकाली दल के टिकट पर 1967, 1969 और 1972 में विधायक चुने गए।
वर्ष 1977 मे सांसद बन गए। नवंबर 1989 में अकाली दल के प्रधान और 2000 मे एसजीपीसी के प्रधान बने। लौह पुरुष की उपाधि से विभूषित जत्थेदार जगदेव सिंह तलवंडी की 2014 मे मौत के बाद से उनके बड़े बेटे जत्थेदार रंजीत सिंह तलवंडी की बादल परिवार से दूरी बढ़ती चली गई। वर्ष 2020 मे जत्थेदार रंजीत सिंह तलवंडी अकाली दल को अलविदा कहकर अकाली दल संयुक्त मे शामिल हो गए। उनकी बहन हरजीत कौर सिद्धू तलवंडी अकाली दल संयुक्त मे शामिल हो गई। उनके छोटे भाई जत्थेदार जगजीत सिंह तलवंडी ने बादल परिवार का दामन थामे रखा और अपने भाई से अलग राजनीतिक रास्ता अपना लिया। इन दिनों दोनों तलवंडी भाई अपने अपने प्रत्याशी के प्रचार मे जुटे हैं। विरोधी उनके परिवार में राजनीतिक बिखराव देख कर चुटकी ले रहे हैं। अकाली दल के नेता और कार्यकर्ता बेहद निराशा हैं ।
जत्थेदार जगजीत सिंह तलवंडी से संपर्क करने पर उन्होंने कहा वो अपने मरहूम पिता लौह पुरुष जत्थेदार जगदेव सिंह तलवंडी की विरासत को संजोकर आगे बढ़ा रहे हैं। अब ये विचारधारा की लड़ाई है। वो चट्टान की तरह अकाली दल बादल के साथ खड़े हैं। रही बात उनके बड़े भाई को अकाली दल मे वापस लाने की इसके लिए पारिवारिक तौर पर कोशिश जारी है।
जोश के साथ चुनाव मैदान में हैं : रंजीत सिंह
अकाली दल बादल छोड़ कर अकाली दल संयुक्त में शामिल हुए जत्थेदार रंजीत सिंह तलवंडी ने कहा कि भाजपा में शामिल हुए गुरपाल सिंह गोल्डी को उन्होंने अकाली दल संयुक्त के चुनाव चिह्न टेलीफोन पर लड़ाकर पहली बाजी तो मार ली है। वो पूरे जोश के साथ चुनाव मैदान में हैं और फतेह भी होगी। अकाली दल छोड़ने के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि बादल परिवार हमेशा तलवंडी परिवार की चड़दी कलां से भयभीत रहा है। तलवंडी परिवार को कमजोर करने के लिए बादल परिवार हमेशा षड़यंत्र रचता रहा। अब इस पंथक हलका रायकोट को बसपा के लिए छोड़कर बादल परिवार ने इसे प्रमाणित भी कर दिया है कि उन्हें पार्टी से नहीं सिर्फ अपने परिवार से मतलब है। ऐसे ही कई मतभेद के चलते उन्होंने अकाली दल छोड़कर अकाली दल संयुक्त को चुना है। छोटे भाई जत्थेदार जगजीत सिंह तलवंडी के अलग रास्ते चलने के सवाल पर उन्होंने कहा कि सभी की अपनी आजाद सोच और विचारधारा है, जिसे वो बदल नहीं सकते।
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