म्यांमार ने भारत को गरजन और क्यूरिंग लकड़ी के निर्यात पर पाबंदी लगा दी है, इससे देश के प्लाईवुड उद्योग का सारा गणित गड़बड़ा गया है। इस लकड़ी का उपयोग प्लाईवुड का टॉप फेस विनीयर बनाने में हो रहा था। इस तरह की लकड़ी के लिए उद्योग पूरी तरह से आयात पर निर्भर है। अब उद्यमी इसका विकल्प तलाशने में जुट गए हैं। विकल्प के तौर पर दक्षिण अफ्रीका, कनाडा और जर्मनी की लकड़ी को ट्राई किया जा रहा है।
म्यांमार में पाबंदी लगने के बाद देश में टॉप फेस विनीयर में उपयोग होने वाली लकड़ी की किल्लत पैदा हो गई है। किल्लत और इनपुट लागत बढ़ने के चलते देश की सभी प्लाईवुड और प्लाईबोर्ड निर्माता कंपनियों ने उत्पादों की कीमत में दो से तीन रुपये प्रति वर्ग फीट का इजाफा कर दिया है। पंजाब प्लाईवुड मैन्यूफैक्चरर्स एसोसिएशन ने भी इस पर अमल किया है। एसोसिएशन ने यह भी साफ किया है कि यदि बिजली महंगी हुई तो जून से एक रुपया प्रति वर्ग फीट और इजाफा करने का ऐलान भी किया जाएगा।
पहले प्लाईवुड का फेस टॉप विनीयर बनाने के लिए विदेश के अलावा असम में पैदा होने वाली लकड़ी का भी उपयोग किया जा रहा था। लेकिन 1997 से केंद्र सरकार ने असम में लकड़ी काटने पर प्रतिबंध लगा दिया। इसके बाद सारा उद्योग आयात पर निर्भर हो गया। टॉप फेस के लिए अधिकतर लकड़ी म्यांमार से आ रही थी। एक माह पहले ही लगे प्रतिबंध के बाद उद्योग के लिए नया संकट पैदा हो गया है।
एसोसिएशन के प्रधान इंद्रजीत सिंह सोहल कहते हैं कि अब टॉप फेस के लिए दक्षिण अफ्रीका की अकूमे, बिंटागर के अलावा कनाडा और जर्मनी की विभिन्न लकड़ियों पर ट्रायल किया जा रहा है। इसमें दो-तीन माह का वक्त लग जाएगा। तब तक पहले से पड़े स्टॉक का ही इस्तेमाल किया जा रहा है। सोहल का कहना है कि किल्लत के दौर में पंजाब के एमएसएमई सेक्टर में लगी प्लाईवुड यूनिट बड़ी इकाईयों से किसी तरह टॉफ फेस के लिए लकड़ी लेकर काम चला रहे हैं। लेकिन लकड़ी की किल्लत से उत्पादन में 25 से तीस फीसदी तक की कमी आई है।
एसोसिएशन के चेयरमैन अशोक जुनेजा ने कहा कि किल्लत के कारण भी लकड़ी महंगी हो रही है। इसके अलावा केमिकल्स और अन्य उत्पादों की महंगाई ने भी प्लाईवुड को महंगा कर दिया है। इसे मजबूरी में ग्राहकों तक पासऑन किया जा रहा है। जुनेजा ने कहा कि इस एग्रो आधारित उद्योग में जान फूंकने के लिए सरकार कृषि की तर्ज पर राहत दे।