लुधियाना में जालंधर बाइपास स्थित एक निजी स्कूल को 10वीं की छात्रा हरसिमरत कौर को कक्षा से बेदखल करना महंगा पड़ा है। लोक अदालत के सख्त निर्देशों के बाद स्कूल प्रबंधन को आखिरकार झुकना पड़ा। विद्यालय प्रशासन ने छात्रा को वापस 10वीं कक्षा में दाखिला देकर पढ़ाई की अनुमति दे दी है।
हरसिमरत के पिता बलकार सिंह ने अपनी याचिका में बताया कि उनकी बेटी ने नौवीं की परीक्षा सफलतापूर्वक पूरी की थी। स्कूल ने स्वयं ही उसे 10वीं में भेजा था। छात्रा कई महीनों से नियमित कक्षाएं ले रही थी। हालांकि, मध्य में प्रबंधन ने अचानक हरसिमरत और करीब एक दर्जन अन्य विद्यार्थियों पर नौवीं कक्षा में वापस जाने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। उन्हें स्थानांतरण प्रमाण पत्र लेकर स्कूल छोड़ने को भी कहा गया।
परिजनों को झुकाने के लिए छात्रा के नंबर रोक लिए गए और कक्षा में प्रवेश बंद कर दिया गया। पिता ने प्रधानाचार्य के हस्ताक्षर वाली बच्ची की डायरी को साक्ष्य बनाकर अदालत का दरवाजा खटखटाया। उन्होंने सीबीएसई और बाल अधिकार संरक्षण आयोग से भी शिकायत की थी।
लोक अदालत का सख्त आदेश
मामले की गंभीरता और छात्रा के भविष्य को देखते हुए लोक अदालत ने सख्त आदेश जारी किए। अदालत ने स्कूल को निर्देश दिया कि अगली सुनवाई तक बच्ची की पढ़ाई में कोई बाधा न डाली जाए। उसे नियमित कक्षाओं में बैठने दिया जाए। अदालत ने परिजनों को किसी भी प्रकार से प्रताड़ित करने पर पूरी तरह रोक लगा दी। स्कूल प्रबंधन को 12 अक्तूबर के लिए समन जारी किया गया है।
प्रबंधन को झुकने पर मजबूर होना पड़ा
पिता जब अदालती आदेश लेकर स्कूल पहुंचे तो शुरुआती टालमटोल हुई। इसके बाद प्रबंधन को छात्रा को प्रवेश देने के लिए मजबूर होना पड़ा। यह न्यायपालिका के कड़े रुख का परिणाम है। इस फैसले से स्कूल की मनमानी पर रोक लगी है।