फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट आर्गेनाइजेशन (फियो) ने साफ किया है कि अब निर्यातकों के लिए रेल किराया व्यवहारिक नहीं रह गया है। हालत यह है कि रेलवे द्वारा लुधियाना से जवाहर लाल पोर्ट ट्रस्ट मुंबई कंटेनर भेजने की लागत, जेएनपीटी से यूरोप माल भेजने की लागत से अधिक पड़ रही है। ऐसे में निर्यातक की लागत बढ़ रही है और वे विश्व बाजार की चुनौतियों का मुकाबला नहीं कर पा रहे हैं। फियो ने केंद्र से मांग की है कि रेलवे के किराए तर्कसंगत बनाए जाएं।
फियो के प्रेसिडेंट एससी रल्हन ने कहा कि रेलवे के किराए में वर्ष 1999-2000 के 129 फीसदी की बढ़ोतरी के मुकाबले वर्ष 2012-13 में 163 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। रल्हन ने कहा कि इन वजहों से कई बार देश के अंदर माल भेजने की लागत विदेश भेजने की लागत से ज्यादा होती है। फियो प्रमुख ने कहा कि मंत्रालय की रिपोर्ट के मुताबिक रेलवे ने सातवीं पंचवर्षीय योजना (1985-90) के दौरान अपने कुल खर्च का 56 फीसदी खर्च ट्रांसपोर्ट सेक्टर पर किया, लेकिन 11वीं पंचवर्षीय योजना (2007-12) के दौरान इस खर्च को घटाकर मात्र 30 फीसदी कर दिया गया।
भारतीय रेलवे की तरफ से पिछले दो दशक में जरूरत के मुकाबले कम निवेश किया गया जबकि सड़क क्षेत्र में इस दौरान काफी अधिक निवेश किया गया। देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में रेलवे की हिस्सेदारी महज एक फीसदी है। असल में 2012-13 में यह 0.9 फीसदी के स्तर पर चला गया था। रल्हन ने कहा कि मालभाड़े से रेलवे को 66 फीसदी राजस्व की प्राप्ति होती है। इसलिए रेलवे को माल भाड़े प्रतिस्पर्धात्मक करने, इंफ्रास्ट्रक्चर मजबूत करने पर फोकस करना होगा।