सुनाम ऊधम सिंह वाला। भूजल बचाने के उद्देश्य से पंजाब सरकार ने धान की किस्म पूसा-44 पर प्रतिबंध लगाया है, लेकिन पंजाब में इसी किस्म की रोपाई को तवज्जो दी जा रही है। सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि पूसा-44 हरियाणा में प्रतिबंधित नहीं है और पंजाब के किसान ने हरियाणा से बीज की आपूर्ति की है। इससे पंजाब के सीड विक्रेताओं का धंधा भी फीका पड़ रहा है और हरियाणा में बिज़नेस शिफ्ट हो रहा है। दूसरी तरफ किसान भी इस किस्म की बिजाई करने को मजबूरी बता रहे हैं। किसानों का तर्क है कि एक तरफ इस किस्म से धान ज्यादा प्राप्त होता है और शेलर उद्योग इसी किस्म को तरजीह देते हैं। शेलर उद्योग से जुड़े कारोबारी इस किस्म को तरजीह इसलिए देते हैं, क्योंकि इस किस्म के धान से चावल अधिक निकलता है और डैमेज भी कम होता है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि पंजाब आखिर भूजल संकट को कैसे दूर कर पाएगा?
सबसे लंबी अवधि में पकने वाली धान की किस्म पूसा-44 पर सरकार के प्रतिबंध के बावजूद मालवा का किसान, हरियाणा से इसके बीज प्राप्त कर रहे हैं। ज्यादातर मालवा इलाका हरियाणा की सीमा से सटा है। मुख्यमंत्री भगवंत मान का गृह जिला संगरूर समेत मानसा, बठिंडा, पटियाला, मुक्तसर आदि हरियाणा से सटे हैं। रोपाई के शुरुआती चरण में पूसा 44 को ही प्राथमिकता दी जा रही है। पंजाब सरकार ने अप्रैल में पूसा-44 की बिक्री पर प्रतिबंध लगा दिया था। इस किस्म ने पंजाब के भूजल पर काफी असर डाला है। संगरूर के एक किसान ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि उन्होंने प्रतिबंध के बावजूद पूसा-44 की रोपाई की है। उन्हें मालूम है कि इसकी अनुमति नहीं है, लेकिन आजीविका इसी पर निर्भर करती है। कम अवधि वाली किस्मों की तुलना में इसकी उपज 5-6 क्विंटल अधिक है और मिलर्स इस किस्म को हाथों हाथ लेते हैं। उन्होंने कुछ अन्य किस्मों की रोपाई भी की है।
जिला खेतीबाड़ी अधिकारी डाॅ. डीएस सिद्धू इससे साफ इन्कार कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि जिले में पीआर 131, 121, 122 समेत अन्य प्रमाणित किस्मों की रोपाई हो रही है। विभाग की टीमें नियमित निरीक्षण कर रही हैं और विभाग इस पर नजर रखे हुए है। उनके ध्यान में ऐसा कोई मामला सामने नहीं आया है।
जागरूक किसान और खेती माहिर सोहन भंगू ने कहा कि सरकार इस मामले में पूरी तरह से कमर कसे। इस किस्म के बीज तैयार करने पर पूरे देश में रोक लगे। धान रोपाई की तारीख को कम से कम तीन सप्ताह आगे बढ़ाया जाए। जुलाई में बरसात शुरू हो जाती है, जबकि 10 से 25 जून की अवधि में तो सबसे ज्यादा पानी की जरूरत रहती है। भूजल का दोहन इसी अवधि में ज्यादा होता है। उन्होंने बताया कि पूसा 44 के एक क्विंटल धान से करीब सत्तर किलो चावल प्राप्त होता है, जबकि अन्य किस्मों से 67 किलो चावल मिलता है। ऐसे में प्रदेश सरकार, पंजाब के भूजल को बचाने के लिए केंद्र से शेलर उद्योग के लिए खास रियायत दिलाए। तब शेलर उद्योग भी इस किस्म को तरजीह नहीं देगा। जब तक बाजार अर्थशास्त्र पूसा-44 के पक्ष में है, किसान इसकी खेती के तरीके खोजते रहेंगे।
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फोटो । सुनाम के खेत में हुई धान की रोपाई।