सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायर्नमेंट (सीईसी) की रिपोर्ट में ब्रेड एवं बेकरी उत्पादों में कैंसर की बीमारी देने वाले रसायन पाए जाने की खबर से ब्रेड निर्माता सकते में हैं।
ब्रेड निर्माताओं ने अपनी स्थिति साफ करते हुए कहा है कि ब्रेड और अन्य उत्पादों में पोटेशियम ब्रोमेट या पोटेशियम ऑयोडेट जैसे कैमिकल सरकारी मानकों के अनुसार ही इस्तेमाल में लाए जा रहे हैं। इंडस्ट्री किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं कर रही है। यदि सरकार को लगता है कि इससे बीमारी हो सकती है तो इस पर प्रतिबंध लगाए और इंडस्ट्री को तैयारी के लिए दो तीन माह का वक्त दे।
उनकी मांग है कि मामले की छानबीन और जांच के लिए एफएसएसएआई के नेतृत्व में कमेटी बनाई जाए। ताजा स्थिति पर मंथन और आगे की रणनीति बनाने के लिए 26 मई को ऑल इंडिया ब्रेड मैन्यूफैक्चर्स एसोसिएशन (एआईबीएमए) की बैठक बुलाई गई है। एआईबीएमए के राष्ट्रीय प्रधान और किट्टी ब्रेड लिमिटेड के चेयरमैन कम मैनेजिंग डायरेक्टर रमेश मागो का कहना है कि यह इंग्रिडिएंट्स अमेरिका में भी उपयोग हो रहे हैं। केवल यूरोप के कुछ देशों ने इस पर प्रतिबंध लगाया है। मागो ने कहा कि सदियों से ब्रेड और मैदा से बनने वाले उत्पादों में इनका उपयोग किया जा रहा है। इनको सरकार की भी मंजूरी मिली हुई है। मैदा और ब्रेड की क्वालिटी बेहतर बनाने के लिए ही उनका उपयोग किया जाता है।
मागो ने कहा कि फूड सेफ्टी एंड स्टेंडडर्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (एफएसएसएआई) के फूड उत्पाद मानकों के तहत पोटेशियम ब्रोमेट को ब्रेड में अधिकतम 50 पीपीएम तक मिक्स किया जा सकता है। बेकरी उत्पादों के लिए उपयोग होने वाले मैदा में इसे बीस पीपीएम तक उपयोग किया जा सकता है। ब्रेड उद्योग पूरी तरह से सरकारी नियमों के अनुसार उत्पादन कर रहा है। यदि सरकार इसमें बदलाव लाएगी तो इंडस्ट्री उसके अनुसार काम करेगी।
चार हजार करोड़ की है ब्रेड इंडस्ट्री
देश में करीब चार हजार करोड़ रुपये की ब्रेड इंडस्ट्री है। देश में करीब 75 फीसदी व्हाइट ब्रेड का उपयोग किया जाता है, 15 फीसदी ब्राउन ब्रेड और दस फीसदी फ्रूट ब्रेड का उपयोग हो रहा है। 2020 तक देश का ब्रेड मार्केट छह हजार करोड़ के आंकड़े को छू सकता है। बावजूद इसके देश में विश्व के अन्य देशों के मुकाबले प्रति व्यक्ति ब्रेड की खपत काफी कम है।