हलवारा (लुधियाना) । मिदनापुर बंगाल के शहीद खुदी राम बोस के बाद सब से कम उम्र में देश की आजादी के लिए शहीद होने वाले करतार सिंह सराभा के पुश्तैनी घर की उपरी मंजिल आज भी खंडहर दिखाई पड़ती है। बोस ने 17 वर्ष, जबकि सराभा ने 19 वर्ष की छोटी उम्र में हंसते हंसते फांसी के फंदे को चूम कर इतिहास रच दिया था। 1997 में सरकार बनने पर मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने कैबिनेट की पहली बैठक में शहीद करतार सिंह सराभा के खंडर हो चुके पुश्तैनी मकान को पारंपरिक तरीके से उसी तरह दोबारा बनाने के साथ-साथ एक यादगारी स्मारक और लाइब्रेरी बनाने की घोषणा की थी। लेकिन 18 वर्ष बीत जाने के बाद भी वह वादा पूरी तरह निभाया नहीं जा सका है।
विरासत में शहीद सराभा के भतीजे नरशेर सिंह गरेवाल के हिस्से में आए इस पुश्तैनी घर को नरशेर ने इसे बिना मुआवजा पंजाब सरकार को दे दिया था। जिसे सरकार ने पुरातत्व विभाग को सौंपा, वहां शहीद करतार सिंह सराभा की यादगार बना दी गई। इसके अलावा गांव कि पंचायत द्वारा दी गई दो एकड़ की जमीन पर स्मारक एव लाइब्रेरी बनाने का भी ऐलान किया गया था। सरकार ने 18 साल में सवा करोड़ की लागत से स्मारक एवं लाइब्रेरी तो बना दी। लेकिन पुश्तैनी मकान की उपरी मंजिल आज भी खंडहर नजर आती है। दो एकड़ में बने स्मारक में शहीद सराभा की 11 लाख रुपये की कांस्य प्रतिमा, 111 फुट उंची मशाल और लाइब्रेरी भी बना दी गई है। जिस का उद्घाटन 16 नवंबर 2008 को शहीद सराभा की बरसी वाले दिन किया गया था। हैरानीजनक यह है कि पुशतैनी मकान की उपरी मंजिल को पुरातत्व विभाग की देख रेख में पीडब्लूडी विभाग द्वारा मुकम्मल किया जाना था। लेकिन लोगों में बढ़ती नाराजगी और मीडिया में किरकिरी होता देख जल्दबाजी में उपरी मंजिल की छत को पारंपरिक तरीके से लकड़ी की मीनाकारी करने कि बजाय आम लैंटर डाल खानापूर्ती कर दी गई और उसे दोबारा तोड़ा जाएगा।
पुरातत्व विभाग की तरफ से पुश्तैनी मकान के केयर टेकर 70 वर्षीय बावा सिंह ने बताया कि लैंटर पड़ी छत को अब दोबारा तोड़ा जाएगा और दोबारा पारंपरिक तरीके से बनाया जाएगा। उल्लेखनीय है कि शहीद सराभा की यादगार एवं स्मारक को पूरा होते देखने का सपना आंखों में लिए ही शहीद सराभा की बहन पंजाब माता के नाम से विभूषित माता जगदीश कौर इस दुनिया से रूखस्त हो गई। अपने जीते जी पंजाब माता जगदीश कौर इन अधूरे कामों को पूरा करने के लिए संघर्ष करती रही। लेकिन शहीद सराभा का पुश्तैनी मकान आज भी सरकार के झूठे वादों की कहानी बयान कर रहा है।
सराभा गांव कि नवनियुक्त सरपंच जगजीत कौर का कहना है कि अभी पुरानी पंचायत ने उन्हें रिकार्ड नहीं सौंपा है। पूरे अधिकार मिलने के बाद सबसे पहले शहीद सराभा के पुश्तैनी मकान की उपरी मंजिल का काम पूरा करवाया जाएगा। शहीद करतार सिंह सराभा यादगारी स्पोर्ट्स क्लब के पदाधिकारी सूबेदार उजागर सिंह ने कहा कि उन्होंने और अन्य सदस्यों ने इस बाबत विधायक मनप्रीत सिंह अयाली से संर्पक किया है जिन्होंने जल्द पुश्तैनी मकान का अधूरा काम पूरा करवाने का भरोसा दिया है। 19 वर्ष की छोटी उम्र में देश की आजादी के लिए शहीद होने वाले गदर लहर के महान शहीद करतार सिंह सराभा को आज तक सरकारी तौर पर कौमी शहीद का दर्जा न मिलने से गांव वासी एवं उनके पारिवारिक सदस्य बेहद नाराज एवं निराश हैं।
शहीद सराभा के भतीजे नरशेर सिंह गरेवाल की पुत्रवधु जसविंदर कौर सरकार के बेहद उदासीन रवैये से खासा खफा है। उनका कहना है कि हरेक वर्ष शहीद सराभा की बरसी 16 नवंबर को मनाई जाती है और हरेक वर्ष मुख्यमंत्री खुद आते हैं और भरोसे देते हैं कि जल्द ही शहीद सराभा को कौमी शहीद का दर्जा मिल जाएगा। लेकिन नतीजा आज भी सिफर है। शहीद करतार सिंह सराभा मेमोरियल ट्रस्ट, स्पोर्टस क्लब, पंचायत एवं गांव वासी लंबे समय से इसके लिए संघर्षषील हैं, लेकिन सरकार कुछ नहीं कर रही।
एक सनसनीखेज खुलासा करते हुए जसविंदर कौर ने बताया कि सरकार ने उनके परिवार वालों को कोई सुविधाएं नहीं दी। सुविधायों के नाम पर उन्हें मोहाली के 11 फेज में एमआइजी फ्लैट अलाट किया गया। जिस पर बाद में ताला तोड़ किसी ने कब्जा कर लिया। अब पुडा के अधिकारी ही कह रहे हैं कि कब्जा करने वाले के खिलाफ कार्रवाई कर रहे है। जसविंदर कौर ने बताया कि नरशेर सिंह बुजुर्ग हो चुके हैं। इस सब के लिए संघर्ष कर रहे उनके पति रुपिंदर सिंह गरेवाल की 30 जून को मौत हो गई। अब तो घर में कोई संघर्ष करने वाला भी नहीं है।
उल्लेखनीय है कि 24 मई 1896 को सराभा में पिता मंगल सिंह और माता साहिब कौर के घर जन्में करतार सिंह सराभा 1912 में अमरिका पढ़ने गए। वहां वह गदर लहर में शामिल हो गए। वह गदर लहर अखबार के संपादक भी रहे। भारत आने पर 19 फरवरी 1915 को गिरफ्तार हो गये। 13 सितंबर 1915 को उन्हें फासी की सजा सुनाई गई। 16 नवंबर 1915 को उन्हें फांसी दे दी गई।