पंजाब में शिरोमणि अकाली दल में विधायक मनप्रीत सिंह अयाली की आवाज और मांग को लेकर अकाली दल के तमाम नेताओं ने चुप्पी साध ली है। हालांकि पहले कोई भी नेता बादल परिवार के खिलाफ आवाज उठाता था तो अकाली दल के दिग्गज फ्रंट खोल देते थे और पूरा पोस्टमार्टम करते थे। यह पहली बार है कि मनप्रीत अयाली ने खुलेआम अकाली दल की लीडरशिप को चुनौती दी और उसके खिलाफ किसी नेता ने एक शब्द तक नहीं बोला। उल्टा मनप्रीत सिंह अयाली को पार्टी में समर्थन मिलना शुरू हो गया है, जिससे पार्टी सुप्रीमो सुखबीर बादल असहज हो गए हैं। जिस तरह से पार्टी के भीतर सन्नाटा पसर गया है, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि आगामी दिनों में अकाली दल में बड़ा विस्फोट हो जाए।
1. सरमुख सिंह झब्बाल
2. बाबा खड़क सिंह
3. करम सिंह बस्सी
4. मास्टर तारा सिंह
5. गोपाल सिंह कौमी
6. तारा सिंह
7. तेजा सिंह
8. बाबू लाभ सिंह
9. ऊधम सिंह नागोके
10. ज्ञानी करतार सिंह
11. प्रीतम सिंह गोजरा
12. हुकम सिंह
13. संत फतेह सिंह
14. अच्छर सिंह
15. भूपेंदर सिंह
16. मोहन सिंह तूड़
17. जगदेव सिंह तलवंडी
18. हरचंद सिंह लोंगोवाल
19. सुरजीत सिंह बरनाला
20. सिमरजीत सिंह मान
21. प्रकाश सिंह बादल
22. सुखबीर सिंह बादल
पंजाब पूरे देश में एकमात्र ऐसा राज्य है जिसका बंटवारा भाषा के आधार पर हुआ। राजसी तौर पर जीवित रहने के लिए अकाली दल ने आंदोलन किया। 1966 में पंजाब का विभाजन हुआ। तब से लेकर आज तक अकाली दल में कई बार विभाजन का दौर देखा, कई बार अकाली दल टूटा, लेकिन अकाली दल में कभी भी विश्वास का संकट नहीं उत्पन्न हुआ। अब अकाली दल के भीतर जबरदस्त रोष फैल रहा है।
पार्टी के तीन विधायक हैं और उनके नेता मनप्रीत सिंह अयाली ने ही मोर्चा खोल दिया है। अक्तूबर 2015 में पंजाब में श्री गुरुग्रंथ साहिब की बेअदबी के बाद अकाली दल पर अविश्वास के बादल मंडराने लगे। बेअदबी कांड के बाद पंथक वोट बैंक टूटता चला गया। पंथक वोट बैंक को बचाए रखने के अकाली दल के सारे प्रयास व्यर्थ साबित हुए। 2017 के विधानसभा चुनाव में अकाली दल हाशिये पर आ गई। चुनाव में अकाली दल को मात्र 15 सीटें ही मिली। अब 2022 में महज तीन सीट ही मिली, जिसमें एक सीट पर बिक्रम सिंह मजीठिया की पत्नी चुनाव जीती हैं जबकि दोआबा में डॉ. सुखविंदर सुक्खी और मालवा की 69 सीटों में अकाली दल को महज एक सीट मनप्रीत सिंह अयाली की मिली है।