पंजाब सरकार सूबे में 117 स्कूल ऑफ एमीनेंस खोलने की तैयारी कर रही है और शिक्षकों को विदेश में ट्रेनिंग के लिए भेजने का सिलसिला शुरू कर दिया है। जमीनी स्तर पर सरकारी स्कूल अभी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं, जिनके बिना स्कूलों में गुणवत्ता वाली शिक्षा नहीं मिल सकती है। पंजाब के सरकारी स्कूलों में इंटरनेट की कमी है। कई गांवों में इंटरनेट के टावर न होना भी मुख्य कारण है। हालात यह है कि सूबे में कुल 29 हजार 259 स्कूल हैं, जिनमें से 12 हजार 219 स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा ही नहीं है।
3206 स्मार्ट स्कूल भी इंटरनेट से वंचित हैं। लिहाजा, शिक्षकों व विद्यार्थियों के लिए काफी परेशानी हो रही है। ऑनलाइन क्लास के अलावा काफी सिलेबस इंटरनेट पर है, लेकिन करीब 50 फीसदी स्कूलों में इंटरनेट की सुविधा न होने से शिक्षा पर असर पड़ रहा है। हालांकि कंप्यूटर की शिक्षा 6वीं कक्षा से जरूरी है और तमाम स्कूलों में कंप्यूटर लैब स्थापित हैं, लेकिन इन कंप्यूटर को बिना इंटरनेट के चलाया जा रहा है। इतना ही नहीं पंजाब में मैरिटोरियस स्कूलों को भी ऑक्सीजन की जरूरत है। स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है।
पहले जमीनी स्तर पर सुधार जरूरी, लीपापोती से नहीं चलेगा काम
सेवानिवृत्त प्रिंसिपल व नामवर साहित्यकार सुरेश सेठ का कहना है कि आम आदमी पार्टी की सरकार को पहले पंजाब में जमीनी स्तर पर शिक्षा की सुविधाएं मुहैया करवानी होंगी। कैसे संभव होगा जब 12 हजार से अधिक स्कूलों में इंटरनेट सुविधा नहीं है। एक तरफ पूरा भारत डिजिटल इंडिया के लिए खड़ा हो रहा है और पंजाब के आधे स्कूल इंटरनेट से वंचित हैं। पंजाब के प्रिंसिपल व शिक्षकों को विदेश भेजना अच्छी बात है, दिल्ली माॅडल ला रहे हैं प्रचार कर रहे हैं, लेकिन सुविधाएं कौन देगा?