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विदेश से पंजाब लौटे चेहरे राजनीति में छाए: एनआरआई नेटवर्क बना पार्टियों की नई ताकत, मान रहे नई चुनावी पूंजी

Tue, 08 Sep 2026 10:08 AM IST
Nivedita सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर

सार

पंजाब की प्रमुख पार्टियां प्रवासी पृष्ठभूमि वाले चेहरों को महत्व दे रही हैं। दोआबा में इसका असर ज्यादा दिख रहा है जहां बड़ी संख्या में परिवारों के सदस्य विदेश में रहते हैं।
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पंजाब में विदेश से लाैटे चेहरे - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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2027 के विधानसभा चुनाव में मुकाबला केवल स्थानीय संगठन की ताकत से तय नहीं होगा। विदेशों में कारोबार नौकरी और सामाजिक नेटवर्क बनाने वाले पंजाबी चेहरे अब सीधे पंजाब की सियासत में उतर रहे हैं। 

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कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन और दुबई से लौटे इन चेहरों की सबसे बड़ी ताकत विदेश में बनाया संपर्क है। सामाजिक माध्यमों की पहुंच और प्रवासी पंजाबियों से जुड़ाव इन्हें राजनीतिक दलों के लिए उपयोगी बना रहा है।
 
विदेश में रहने वाले रिश्तेदार घर के राजनीतिक फैसलों में भी प्रभाव रखते हैं। यह नेटवर्क अब केवल प्रवासी वोट और आर्थिक मदद तक सीमित नहीं है बल्कि चुनावी प्रचार जनमत निर्माण और संगठन की ताकत में बदल रहा है। 
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कांग्रेस के सुखपाल सिंह खैरा और आप के कुलदीप सिंह धालीवाल इसके प्रमुख उदाहरण हैं। धालीवाल अमेरिका से लौटने के बाद पंजाब सरकार में प्रवासी मामलों के मंत्री भी रहे हैं। बलतेज पन्नू ने कनाडा में पत्रकारिता से पहचान बनाई और बाद में पंजाब की राजनीति में प्रभावशाली चेहरा बने।

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प्रवासी नेताओं का बढ़ता प्रभाव
आप के शुरुआती दौर में जगतार सिंह संघेरा ने विदेशों में बसे पंजाबियों को पार्टी से जोड़ा। उन्होंने कनाडा समेत कई देशों में पार्टी के समर्थन अभियानों में सक्रिय भूमिका निभाई और पंजाब लौटने के बाद संगठन में अहम जिम्मेदारियां संभालीं। 

सुखपाल सिंह खंगूड़ा ने ब्रिटेन में लंबे समय तक रहने और कारोबार करने के बाद पंजाब की राजनीति का रुख किया। जसवीर सिंह गिल उर्फ जस्सी सेखों ने भी कनाडा की स्थापित जिंदगी छोड़कर पंजाब में राजनीति शुरू की। दलजीत सिंह ग्रेवाल विदेश से जुड़े कारोबारी नेटवर्क को छोड़कर आप के टिकट पर विधायक बने।

अमृतपाल का सफर सबसे अलग
खडूर साहिब के निर्दलीय सांसद अमृतपाल सिंह का राजनीतिक सफर अन्य प्रवासी नेताओं से अलग है। करीब एक दशक दुबई में रहने के बाद 2022 में पंजाब लौटे अमृतपाल ने वारिस पंजाब दे संगठन की कमान संभाली। उन्होंने कम समय में अपना राजनीतिक आधार बनाया और 2024 के लोकसभा चुनाव में खडूर साहिब से बड़ी जीत हासिल की। यह विदेश से लौटकर तेजी से राजनीतिक प्रभाव बनाने का उदाहरण है।

कनाडा निवासी जसविंदर सिंह के अनुसार विदेशों में बसे पंजाबी अब केवल पैसा भेजने वाला समुदाय नहीं हैं। वे सामाजिक माध्यमों पर राय बनाते हैं और राजनीतिक संदेश पहुंचाते हैं। विदेश से लौटने वाले नेता इस नेटवर्क को सीधे चुनावी राजनीति में इस्तेमाल कर रहे हैं। राजनीतिक दल इन्हें विदेशी नेटवर्क और स्थानीय राजनीति के बीच पुल मानते हैं। ऐसे में 2027 के चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि कोई नेता विदेश से लौटते समय अपने साथ कितना राजनीतिक प्रभाव लेकर आता है।
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