पूर्व विधायक से आशीर्वाद लेते पीएम मोदी।
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अबोहर। अबोहर रैली के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मंच पर बैठने वालों में केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा उम्मीदवारों के साथ 1957 में अबोहर से जनसंघ के विधायक रहे श्री सहीराम बिश्नोई को भी विशेष तौर पर बुलाया गया, जिनका मंच पर पहुंचते ही प्रधानमंत्री मोदी ने आशीर्वाद लेकर उनका सम्मान किया और संक्षिप्त बातचीत में बिश्नोई ने मोदी से सीमावर्ती इलाकों के विकास की मांग उठाई।
हरियाणा के गांव सकताखेड़ा की ढाणी में रहने वाले संयुक्त पंजाब के अबोहर हलका से 1957 में जनसंघ पार्टी के पूर्व विधायक 100 वर्षीय एडवोकेट सही राम बिश्नोई भारत-पाक बंटवारे के बाद परिवार सहित भारत आए और लंबे समय तक संघर्ष करते हुए कांग्रेस की विभाजन नीति का विरोध किया। बिश्रोई ने 1952 में निर्दलीय तौर पर आम चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। इसके बाद उनकी काबिलियत को देखते हुए 1957 में जनसंघ के टिकट पर उन्हें चुनाव मैदान में उतारा गया और वे कांग्रेस प्रत्याशी को हराकर भारतीय जनसंघ पार्टी की नींव सदस्य की तरह पंजाब विधानसभा में पहुंचे थे। बिश्नोई ने 1958 में हिंदी आंदोलन के लिए भी कड़ा संघर्ष किया और कई बार जेल गए। बाद में हरियाणा सरकार ने उन्हें हिंदी आंदोलन सेनानी सम्मान देकर सम्मानित किया।
100 वर्ष की उम्र में भी बिश्नोई बिना चश्मे के रोजाना अखबार पढ़कर और रेडियो सुनकर देश-दुनिया के बारे में अपडेट रहते हैं। जिससे उन्हें स्वस्थ भारत के लिए परफेक्ट रोल मॉडल माना जा रहा है। उनकी दिनचर्या में खेतीबाड़ी में काम करना, सादा भोजन और प्रकृति से जुड़कर रहना शामिल है। पिछले माह उनके जन्मदिन पर मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर ने फोन पर उन्हें बधाई देते हुए आशीर्वाद भी लिया था।
सहीराम बिश्नोई का जन्म 1922 में तत्कालीन संयुक्त भारत (वर्तमान पाकिस्तान) के भावलनगर रियासत के गांव तालिया में हुआ था। उनका परिवार 5000 बीघा का मालिक था और पहले नवाब परिवारों का सीधा आना-जाना था। उस समय अस्पताल और अन्य सुविधाएं बहुत कम होती थीं और वह अपने स्तर पर लोगों को सेवाएं देने के लिए काफी चर्चित थे। इतना सब होने पर भी उन्होंने भारत में बसने का फैसला लिया और यहां आ गए। सहीराम 1947 में लाहौर कॉलेज में लॉ की पढ़ाई कर रहे थे। इसी दौरान बंटवारे के बाद वे भारत आए और लंबे समय तक संघर्ष करते हुए बिश्नोई समाज के विभिन्न धार्मिक स्थलों को स्थापित कराया। आज भी रक्तदान, सैनिक सम्मान और जरूरतमंद परिवारों की शिक्षा सुरक्षा के लिए हर संभव मदद करते हैं।
अबोहर के प्रसिद्ध बिश्रोई मंदिर सहित बिश्नोई समाज के मुख्य मुकाम धाम को कब्जा मुक्त करवाना एवं वर्तमान स्वरूप की नींव रखना उन के संघर्ष से और उनके कर कमलों से संपन्न हुआ है। इतना ही नहीं अबोहर के बिश्रोई मंदिर को कब्जा मुक्त करवाने के लिए उन्होंने अपने रिश्तेदारों के खिलाफ भी मोर्चा खोल दिया था। उनकी ईमानदार शैली और शालीनता एवं नशा एवं कुरीति मुक्त जीवन को बिश्नोई समाज ही नहीं सभी समाज के लोग प्रेरणा के तौर पर अपनाते हैं।