राज्य सरकार की तरफ से सूबे में अवैध कालोनियों पर लगाया गया टैक्स आयकर विभाग को भी रास आने लगा है। अपनी कालोनियों को वैध करवाने के लिए टैक्स अदा करने वाले कालोनाइजरों की लिस्टें आयकर विभाग ने नगर निगम से मांग ली हैं।
पता चला है कि पहले ही आयकर विभाग की बड़े कालोनाइजरों पर नजर थी। अब जिन कालोनाइजरों ने नगर निगम अथवा जेडीए के पास अपनी कालोनियों को वैध करवाने के लिए फीस जमा करवाई है अथवा महज एप्लीकेशन दी है, आयकर विभाग उनकी पुरानी रिटर्न खंगालने की तैयारी में जुट गया है। आयकर विभाग को उम्मीद है कि इस लिस्ट के माध्यम से आयकर चोरी करने वाले कई बड़े व्यक्ति उनकी चंगुल में फंसेंगे। इसके लिए आयकर विभाग ने कसरत करनी आरंभ भी कर दी है।
हालांकि इस मामले में आयकर विभाग का कोई अधिकारी खुलकर बोलने के लिए तैयार नहीं है, लेकिन आयकर विभाग से जुड़े कर्मचारी बताते हैं कि विभाग ने राज्य भर में प्रापर्टी का काम करने वाले लोगों की जन्मकुंडली खंगालने के आदेश दे दिए हैं। इसे लेकर कालोनाइजरों में भी हड़कंप है। कालोनाइजरों का कहना है कि यही कारण था कि वे टैक्स नहीं जमा करवाने चाहते थे।
अवैध कालोनियों, प्लाट और मकान रेगुलर करवाने के लिए अंतिम तिथि 5 नवंबर थी। इस तारीख तक निगम जालंधर के पास 323 अवैध कालोनियों में से 155 कालोनाइजरों ने आवेदन किया था। ऐसे ही जेडीए के पास 502 लोगों ने कालोनियां रेगुलर करवाने के लिए आवेदन किया था। इन्हीं कालोनियों की एनओसी अप्लाई करने वाले कालोनाइजरों पर अब आयकर विभाग की नजर है। आयकर विभाग को संदेह है कि कालोनाइजरों ने उन्हें पूरा टैक्स अदा नहीं किया है।
बताया जा रहा है कि आयकर विभाग नगर निगम से कालोनाइजरों की लिस्ट लेकर उनकी तरफ से जिस वर्ष में कालोनी काटी गई थी, उसके बाद से लेकर अब तक की रिटर्न को खंगालेगा कि व्यक्ति ने कालोनी काटने के वर्ष में क्या उन्हें टैक्स जमा करवाया था। प्रापर्टी से जुड़े व्यवसाय के लोगों का कहना है कि अधिकतर लोगों ने तो अपनी रिटर्न में काटी गई कालोनियों का जिक्र भी नहीं किया है। कई कालोनाइजर आयकर विभाग के डंडे से बच भी जाएंगे क्योंकि उन्होंने कालोनी दूसरे व्यक्ति के नाम से काटी हैं।
टैक्स से भरी भाईचारे में दरार
माडल टाउन से सटे क्षेत्र में प्रापर्टी का व्यवसाय करने वाले एक वरिष्ठ नेता व प्रापर्टी ब्रोकर का कहना है कि उन्हें पहले ही पता था कि आयकर विभाग नगर निगम से लिस्टें मांगेगा। यही कारण है कि अधिकतर कालोनाइजरों ने अपने आवेदन जमा ही नहीं करवाए हैं। इस टैक्स के कारण ही कई भाईवाल प्रापर्टी डीलरों की आपसी सांझ में दरार आ चुकी है। एक प्रापर्टी डीलर टैक्स देने के लिए तैयार था तो दूसरा मना करता था।