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पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी: नए अध्यक्ष के सामने एकजुटता की चुनौती, मोहाली के स्वागत बोर्डों से गरमाई सियासत

Tue, 27 Oct 2026 11:36 AM IST
Nivedita सुरिंदर पाल, अमर उजाला, जालंधर

सार

परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का उद्देश्य विभिन्न धड़ों को साथ लाना था। इसका लक्ष्य 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करना भी है। अब उन्हें शुरुआती सहमति को जिला स्तर तक तालमेल में बदलना होगा।
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पंजाब में कांग्रेस की चुनाैतियां बढ़ीं - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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पंजाब कांग्रेस में परगट सिंह के प्रदेश अध्यक्ष बनने के बाद भी गुटबाजी शांत नहीं हो रही है। हाल के घटनाक्रमों ने पार्टी के भीतर नेतृत्व और आपसी तालमेल पर सवाल खड़े किए हैं। रमिंदर आमला का कांग्रेस छोड़ना, प्रताप बाजवा का बयान और मोहाली में परगट सिंह की तस्वीर न होना प्रमुख मुद्दे हैं।

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पंजाब विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष प्रताप बाजवा ने हाईकमान को सुझाव दिया है। उन्होंने परगट सिंह और खुद को प्रमुख चेहरों के रूप में साथ लेकर चलने को कहा है। बाजवा लंबे समय से पंजाब कांग्रेस की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं। उनके बयान को सामूहिक नेतृत्व की पैरवी के तौर पर देखा जा रहा है। इससे आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी की रणनीति पर सवाल उठते हैं। कांग्रेस के सामने सभी वरिष्ठ नेताओं को उचित स्थान देने की चुनौती है। मोहाली में केसी वेणुगोपाल के स्वागत बोर्डों पर परगट सिंह की तस्वीर नहीं दिखी। यह दर्शाता है कि कांग्रेस का एक गुट परगट सिंह को प्रधान नहीं मानता है। नेतृत्व बदलने के बाद भी अलग-अलग खेमों की पहचान कायम है।

परगट सिंह के सामने चुनौतियां
परगट सिंह को प्रदेश अध्यक्ष बनाने का उद्देश्य विभिन्न धड़ों को साथ लाना था। इसका लक्ष्य 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले संगठन को मजबूत करना भी है। अब उन्हें शुरुआती सहमति को जिला स्तर तक तालमेल में बदलना होगा। टिकटों का बंटवारा और चुनावी प्रचार की कमान महत्वपूर्ण मुद्दे होंगे। संभावित मुख्यमंत्री चेहरे और वरिष्ठ नेताओं के समर्थकों में समन्वय भी चुनौती है। इन मुद्दों पर पार्टी की एकजुटता की असली परीक्षा होगी।
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हाईकमान की भूमिका और बैठकें
26 अक्तूबर को कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव केसी वेणुगोपाल चंडीगढ़ पहुंचे। उनके साथ पंजाब प्रभारी सचिन पायलट भी चंडीगढ़ आए थे। पार्टी नेतृत्व की बैठकों में संगठन को मजबूत करने पर चर्चा प्रस्तावित है। वरिष्ठ नेताओं के बीच तालमेल बढ़ाने और 2027 चुनाव की तैयारी पर भी बात होगी। हाईकमान के सामने प्रदेश नेतृत्व को स्पष्ट दिशा देने की चुनौती है। वरिष्ठ नेताओं की भूमिका को लेकर अनिश्चितता कम करना भी महत्वपूर्ण है।

कांग्रेस में गुटबाजी का पुराना इतिहास
कांग्रेस में गुटबाजी का इतिहास काफी पुराना रहा है। कैप्टन अमरिंदर सिंह और प्रताप बाजवा के बीच नेतृत्व को लेकर खींचतान थी। नवजोत सिंह सिद्धू और तत्कालीन मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी में भी मतभेद रहे। 2021 में कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से हटाया गया। उनके कांग्रेस छोड़ने से पार्टी की अंदरूनी कलह उजागर हुई। 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को सत्ता गंवानी पड़ी थी। चुनाव से पहले नेतृत्व को लेकर खींचतान लगातार चर्चा में रही। रमिंदर आमला चन्नी और परगट धड़े के ताकतवर नेता माने जाते थे। राजा वडिंग के खिलाफ अभियान में आमला का अहम योगदान था। आमला के पार्टी छोड़कर अकाली दल में शामिल होने से गुटबाजी और स्पष्ट हुई है। अब परगट सिंह के नेतृत्व में पार्टी को एकजुट होने की बड़ी जिम्मेदारी है।

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