भारतीय रेलवे ने ट्रैक की स्वच्छता की ओर ध्यान देना शुरू कर दिया है। 2012
से अब तक आरसीएफ कपूरथला ने जितनी बोगियां बनाई हैं, उनमें 17 हजार यूनिट
बॉयो डाइजेस्टर सिस्टम (बीडीएस) स्थापित कर दिए हैं। अब ग्रीन टॉयलेट्स पर
भी आरसीएफ के इंजीनियर्स ने कवायद तेज कर दी है। नए कोचों में ग्रीन
टॉयलेट्स लग ही रहे हैं। एक्सप्रेस, मेल और पैसेंजर ट्रेनों में इन्हें
स्थापित करने के लिए देश भर में स्थापित 17-18 जोनल रेलवे ने कवायद शुरू कर
दी है। इससे रेलवे ट्रैक पूरी तरह से साफ और पर्यावरणीय दृष्टि से सशक्त
होंगे।
महाप्रबंधक आरसीएफ आलोक दवे ने बताया कि भारतीय रेलवे ने सभी
यात्री कोचों में डायरेक्ट डिस्चार्ज प्रणाली को ग्रीन टायलेट्स में
परिवर्तित करने की योजना बनाई है। 2012 से आईसीएफ ने बीडीएस उपलब्ध करवाए
हैं। अब तो एलएचबी (लिंक हॉफमैन बुश) कोच में भी यह लगाने का काम शुरू कर
दिया गया है।
एलएचबी कोच में लगेंगे चार्जिंग सॉकेट
एलएचबी
कोचों में साइड बर्थ में मोबाइल/लैपटॉप चार्जिंग सॉकेट लगाए जा रहे हैं।
मार्च 2015 से परंपरागत कोचों में भी चार्जिंग सॉकेट स्थापित किए जा रहे
हैं। पीएम के स्वच्छ भारत मिशन को आगे बढ़ाते हुए अब पीटीडी की क्षमता 22
से 30 लीटर कर दी गई है। अब यह जनरल और स्लीपर कोचों में भी लगाए जाएंगे।
एलएचबी डिब्बों में बैठे यात्री को स्मूथ जर्नी का अहसास दिलाने के
मद्देनजर मॉडीफाइड कपलर लगाए जा रहे हैं। फायर अलार्म के साथ पावर कार और
पैंट्री कार का भी प्रावधान रखा जा रहा है। नेत्रहीनों के लिए कुछ कोच पर
ब्रेल लिपि वाले नोटिस और संकेतक बोर्डों का प्रावधान भी रखा गया है।
गंदगी को लिक्विड में बदलेगा बैक्टीरिया
जीएम
दवे के अनुसार ट्रेनों में स्थापित टायलेट्स की गंदगी को एक जगह एकत्रित
करने के लिए टैंक स्थापित किया गया है। इस टैंक में गाय के गोबर से तैयार
किया गया बैक्टीरिया भरा जाएगा, जो गंदगी को लिक्विड फार्म में बदल देगा।
एक बार बैक्टीरिया डालने के बाद यह खुद-ब-खुद टैंक में बनता जाएगा। एक दिन
में 80 सिटिंग की गंदगी को यह लिक्विड फार्म में मटमैले पानी में बदल देगा।
यह बैक्टीरिया बिना किसी दवा के एक माह तक जीवित रह सकते हैं। अगर यह कोच
2-3 सप्ताह इस्तेमाल में न आए तो भी गंदगी नहीं फैलेगी। आरसीएफ में
बैक्टीरिया बनाने के लिए अलग से प्लांट स्थापित किया जा रहा है।