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मृतक की हथेली पर गर्म सिक्का रखकर दाह संस्कार

Sun, 05 Jan 2014 09:23 PM IST
अमर उजाला, अटारी बार्डर
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पाकिस्तान में बसे हिंदू और सिख परिवारों को अपने मृत संबंधियों का दाह-संस्कार करने में भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
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हालात यह हैं कि हिंदू-सिख परिवार अपने संबंधी की मौत पर दाह संस्कार की रस्म अदायगी करने को मजबूर हैं। मृतक की दायीं हथेली पर गर्म सिक्सा रखकर दाह संस्कार की रस्म पूरी करने के बाद शव को दफना दिया जाता है।


पाकिस्तान में अधिकांश हिंदू-सिख आबादी वाले शहरों की तरह लगभग 35 हजार की हिंदू-सिख आबादी वाले खैबर पख्तुनख्वाह राज्य में भी कोई श्मशान घाट नहीं है। इसके चलते हिंदुओं और सिखों के लिए अपने संबंधी के अंतिम संस्कार के लिए दो ही रास्ते बचते हैं।
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एक, वे अपने संबंधी के शव को लेकर खैबर एजेंसी के तिराह घाटी, डेरा इस्माइल खां, बन्नू, कोहाट, मालाकंद, सवात, बुनेर, नौशहरा इलाके में जाकर दाह संस्कार करें या फिर शव की हथेली पर गर्म सिक्का रखकर दाह संस्कार की रस्म पूरी करें। पेशावर में बसे हिंदू-सिखों को भी सैकड़ों मील का सफर तय करके हस्सन अबदाल (पंजा साहिब) में दाह संस्कार करने आना पड़ता है।

इस यात्रा के लिए उन्हें 40 से 70 हजार रुपये तक खर्च करना पड़ता है, जोकि पाकिस्तान में आम हिंदुओं और सिख परिवारों की पहुंच से बाहर है।


हाल ही में कोहाट में हिंदू-सिख परिवारों के मृत संबंधी के दाह संस्कार की उक्त रस्म अदायगी सामने आने के बाद खैबर पख्तुनखवाह सरकार ने ख्वाज़ाखेल, मालाकंद, अटक खैराबाद और पेशावर कैंट में हिंदू मंदिरों में हिंदुओं और सिखों को दाह संस्कार की अनुमति तो दे दी है, लेकिन वहां अधिकांश मंदिरों पर भू-माफिया का पहले से ही कब्जा है। नतीजतन मंदिरों में अंतिम संस्कार की क्रिया पूरी कर पाना संभव नहीं रह गया है।


इतिहास शोधकर्ता सुरिंदर कोछड़ का कहना है कि अफगानिस्तान में बसे सिखों को भी ऐसी ही समस्या का सामना करना पड़ रहा है। अगर वे काबुल के कलेचा-ए-बिन-ए-हिसार में मौजूद श्मशान घाट में अंतिम संस्कार करने पहुंचते हैं, तो वहां अवैध कब्जा जमा चुके मुस्लिम समुदाय के लोग उन्हें अंतिम संस्कार करने से यह कहकर मना कर देते हैं कि चिता से उठने वाले धुएं से वातावरण दूषित होगा।

हालात इतने बदतर हैं कि जो अफगानिस्तानी सिख विरोध करते हुए वहां अंतिम संस्कार के लिए पहुंचते हैं, उन पर मुस्लिम समुदाय के लोग पथराव करके उन्हें भागने को मजबूर कर देते हैं और शव की बेकद्री करते हैं।


कोछड़ के अनुसार, पाकिस्तान में हिंदुओं और सिखों की इस समस्या को लेकर आज तक न तो भारत सरकार ने और न ही देश-विदेश की किसी हिंदू-सिख संस्था ने यह मामला उठाया है। इस बीच, शिव सेना राष्ट्रवादी के नेता जय गोपाल लाली ने कहा है कि उनकी पार्टी इस मुद्दे को पूरे सबूतों के साथ केंद्र सरकार के ध्यान में लाएगी और मांग करेगी कि पाकिस्तान सरकार से बातचीत कर वहां बसे हिंदु-सिखों को दाह संस्कार का अधिकार दिलाया जाए।



शव दफनाने भी नहीं देते मुस्लिम समुदाय के लोग
कोछड़ के अनुसार, पिछले साल 6 अक्तूबर को सिंध की तहसील बदीन के पंगरियो कस्बे से सटे गांव कुमदर कारोमल में सड़क हादसे में मारे गए 30 वर्षीय दलित हिंदू भूरू भील का जब उसके परिजन दाह संस्कार करने लगे तो स्थानीय मुसलमानों ने उन्हें यह कहकर रोक दिया कि इस्लामिक देश में वे किसी मृतक को जलाने की अनुमति नहीं देंगे।
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इस पर हिंदुओं ने मृतक के शव को हज फकीर कब्रिस्तान में दफना दिया। शव दफनाए जाने के बारे में जब मुस्लिम समुदाय के लोगों को पता चला तो उन्होंने वहां पहुंचकर कब्र खोद डाली और भील का शव निकालकर घसीटते हुए मुख्य सड़क पर फेंक दिया। सड़क पर करीब आठ घंटे तक मृतक का शव लावारिस हालत में पड़ा रहा। इस मामले में पुलिस ने दोषी पाए गए 19 लोगों के खिलाफ आज तक कोई कार्रवाई नहीं की है।
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