भारत-पाक के बीच 1965 और 1971 के युद्ध की दहशत आज भी फिरोजपुर में सीमा से सटे गांवों में दिखती है। पाकिस्तान की गोलियां चलते ही ग्रामीणों की सांसें अटक जाती हैं। कारगिल युद्ध व सर्जिकल स्ट्राइक के दौरान सीमा पर पैदा हुए तनाव में कई बार बेघर हुए हैं यहां के ग्रामीण। इन गांवों में न डाकखाना है, न बैंक। विकास तो छोड़िए आज भी यहां के बाशिंदे मूलभूत सुविधाओं के लिए तरस रहे हैं।
गांव जल्लोके निवासी गुरदेव सिंह का कहना है कि गांवों में सरकारी परिवहन व्यवस्था तक नहीं है। 22 गांवों में न तो डाकखाना है और न बैंक। गांव टेंडी वाला, हजारा सिंह वाला, भखड़ा, गट्टी राजोके, गट्टी रहिमेके, चांदी वाला व खुंदर गट्टी में प्राइमरी स्कूल है, लेकिन शिक्षकों का अभाव है। खुंदर गट्टी में एक हाई स्कूल है और गट्टी राजोके में सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल है। 22 गांवों में सिर्फ पांच लोगों ने एमए पास किया है, इनमें सुरजीत सिंह, परमजीत सिंह, हरमेश सिंह, सुखविंदर कौर व रानो शामिल हैं। नौकरी किसी को नहीं मिली। तीस लोग बीए पास हैं। इस गांव में से न कोई डॉक्टर, न अधिकारी व न शिक्षक बना है।
सुरजीत सिंह का कहना है कि उक्त गांवों के लिए एक डिस्पेंसरी है, स्टाफ भी लगभग पूरा है। कुछ माह से दवाइयां भी मिल रही हैं। गंभीर मरीज को फिरोजपुर सिविल अस्पताल रेफर किया जाता है। लेकिन यहां पर सरकारी लैब नहीं है, जिस कारण निजी लैब में महंगे टेस्ट कराने पड़ते हैं। यहां के लोग प्रदूषित पानी के चलते चमड़ी रोग, शूगर, दांत व हड्डियों की बीमारियों से ग्रस्त है। इस विधानसभा चुनाव में ही विधायक परमिंदर सिंह पिंकी नजर आया है। उक्त गांवों में एक लाइब्रेरी तक नहीं है, ताकि नौजवानों को पढ़ने-लिखने की सुविधा हो सके।
गट्टी रहिमेके निवासी बलवीर सिंह (69) कहते हैं कि दोनों देशों के युद्ध के अलावा जब भी सीमा पर तनाव की स्थिति पैदा होती है, ग्रामीण सहम उठते हैं। वर्ष 1971 में पाकिस्तान ने दो दिसंबर शाम छह बजे धोखे से युद्ध कर दिया। यह चौदह दिन तक चला। इन गांवों के लोगों को अपना सामान उठाने का मौका तक नहीं मिला। कपड़े और पैसे लेकर किसी तरह नाव के जरिए दरिया पार कर सुरक्षित जगहों पर पहुंचे।
इस युद्ध में पाक फौज ने उनके गांवों पर कब्जा कर लिया था। जब दोनों देशों का समझौता हुआ तो पाक फौज यहां से सभी पेड़, घरों की ईंटें व उनका सामान तक ले गई थी। यही नहीं शहीद-ए-आजम भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव के बुत तक उखाड़कर ले गए थे। दोनों देशों के बीच बिछी रेल पटरी उखाड़ ली थी। सतलुज दरिया पर बना पुल न तोड़ते तो फिरोजपुर पर पाक फौज कब्जा कर लेती। यही हाल वर्ष 1965 के युद्ध में हुआ है।
इसके बाद कारगिल, सर्जिकल स्ट्राइक के समय सीमा पर तनाव की स्थिति पैदा होने पर यहां के लोग घर से बेघर हुए हैं। इतना दुख यहां के लोगों ने झेला है, पर किसी राजनीतिक पार्टी ने उनके विकास के लिए नहीं सोचा। पंजाब में मालवा से 18 मुख्यमंत्री बने किसी ने भी पंजाब से सटी साढ़े पांच सौ किलोमीटर लंबी पट्टी भारत-पाक सरहद पर बसे गांवों के ग्रामीणों की कभी किसी ने खोज खबर नहीं ली है। आज भी उनके बच्चे रोजगार के लिए तरस रहे हैं। रोजगार मिल जाए तो नशे से भी नौजवानों को छुटकारा मिल सकता है। चुनाव के दौरान विभिन्न राजनीतिक पार्टी के नेता आते हैं और वादे कर वोट लेकर खिसक जाते हैं। बाद में कभी गांव में दिखते तक नहीं हैं।