फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Ground Report: 200 गांवों के लिए एक भी कॉलेज नहीं, शिक्षा से वंचित हैं सीमा पर बसने वाले युवा

Fri, 20 May 2022 04:45 PM IST
निवेदिता वर्मा सुरिंदर पाल, अमर उजाला, डेरा बाबा नानक (पंजाब) 

सार

सीमांत गांवों के बुजुर्गों का कहना है कि अपनी आंखों के सामने पंजाब की जवानी को बर्बाद होते देखने का दुख क्या होता है, यह कोई हमसे पूछे। सरकारों ने सुध ली होती तो हालात बेहतर हो सकते थे, लेकिन आजादी के बाद हमें मुकद्दर के भरोसे छोड़ दिया गया।
विज्ञापन
बेरोजगारी और अशिक्षा से जूझ रहे सीमांत गांवों के लोग। - फोटो : अमर उजाला
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

डेरा बाबा नानक पाकिस्तान की सीमा से सटा बड़ा कस्बा है। इससे करीब 200 गांव जुड़े हैं। आसपास के तमाम गांवों में खेतीबाड़ी ही मुख्य धंधा है, जिसके सहारे मजदूर व जमींदार पेट पालते हैं। डेरा बाबा नानक, पखोके टाहली साहब, बल और गांव पखोके महमार में हालात अच्छे नहीं कहे जा सकते। बेरोजगारी और बेकारी ने युवाओं का भविष्य अंधकार में धकेल दिया है। इस अंधेरे को बढ़ाने में सबसे बड़ा हाथ अशिक्षा का है।

विज्ञापन


आधी अधूरी शिक्षा के सहारे कोई युवा अपने पैरों पर कैसे खड़ा हो सकता है। छोटा मोटा धंधा करने के लिए भी हिसाब किताब तो आना ही चाहिए। जिन्होंने थोड़ी बहुत पढ़ाई की है, वह दुकानों से गुजारा कर रहे हैं। हालांकि स्थिति उनकी भी बहुत अच्छी नहीं है। बुजुर्गों का अपना दर्द है। कहते हैं कि हमारी उम्र तो कट गई। अपनी आंखों के सामने पंजाब की जवानी को बर्बाद होते देखने का दुख क्या होता है, यह कोई हमसे पूछे। जिन्हें गोद में खिलाया। लाड़ लड़ाया। वह नशे की जद में आकर जिंदगी तबाह करने पर तुले हैं। कुछ तस्करों के हाथों की कठपुतली बन गए हैं। सरकारों ने सुध ली होती तो हालात बेहतर हो सकते थे, लेकिन आजादी के बाद हमें मुकद्दर के भरोसे छोड़ दिया गया। असल में तो हम पाकिस्तान की सीमा से सटे होने का दंश झेल रहे हैं। न जाने कब सत्ता में बैठे हुक्मरानों को हमारा दर्द समझ में आएगा। 

तस्करी की तरफ जाना मजबूरी है

डेरा बाबा नानक करतारपुर साहिब कॉरिडोर से करीब एक किलोमीटर दूर गांव पखोके टाहली साहब है। आबादी 700 के करीब है और गांव में छोटी मोटी खेती व मजदूरी ही धंधा है। वहां राशन की दुकान चलाने वाले युवा सुखविंदर सिंह का कहना है कि भाई साहब बेरोजगारी है, यहां सीमा पर कोई पूछने नहीं आता। न तो इंडस्ट्री है और न ही कारोबार, भला यहां पर कोई क्यों आएगा ? सरकारों ने हमारे लिए किया ही क्या है ? मैंने खुद मल्टीपर्पज हेल्थ वर्कर का कोर्स किया था। यकीन नहीं होगा आपको, कर्जा लेकर मेरे पिता ने पढ़ाया था और हालात क्या हुए, दर दर की ठोकरें खाने के बाद छोटी सी राशन की दुकान चला रहा हूं। यहां का युवा करेगा क्या ? नशे की तस्करी की तरफ जाना मजबूरी है, कोई शौक नहीं है किसी का। 

बेटे की बात सुनकर रंजोत सिंह कुर्सी से उठ खड़ा हो गया और कहने लगा कि तुसी की गल करदे हो... मेरे तीन मुंडे ने तो तीनों ही बेरोजगार.. मेरी कुड़ी ने स्टाफ नर्स दा कोर्स कित्ता ओह वी घरे बैठी है। गांव में हालात बद से बदतर हैं क्योंकि यहां आकर भारत खत्म हो जाता है और चंद कदम दूरी पर पाकिस्तान के कंटीले तार हैं। गांव के रहने वाले मक्खन सिंह की तो आंखें भर आईं बोले-भाजी मैं ते 100-200 रुपये ही दिहाड़ी दे कमांदा हां... मेरे दोनों बच्चे भी दिहाड़ी पर हैं... दो वक्त का खाने का जुगाड़ ढंग से नहीं हो पाता। यहां का युवा करे तो क्या करे?  

किसी सरकार ने नहीं ली सुध

73 साल के जोगिंदर सिंह ने कहा कि उनकी जिंदगी तो यहां पर बसर हो गई, लेकिन युवाओं की बेरोजगारी ने उन्हें नशे की तरफ धकेल दिया है। कुछ दूरी पर गांव बल है। यहां वृक्ष की छाया में बैठे बचित्र सिंह ने तो अपनी भड़ास ही निकालनी शुरू कर दी। बोले कि किस सरकार ने सीमावर्ती इलाकों की सुध ली है। 50 साल उम्र हो चुकी है मेरी, यहां पर कोई पूछने तक नहीं आया है। शाम को छह सात बजे के बाद सन्नाटा पसर जाता है। कोई काम धंधा क्या करेगा?  हमारे यहां तो एक एक किसान के पास 5-6 एकड़ ही जमीन है, जिसमें कोई खाएगा क्या और बांटेगा क्या ?  सच बताऊं तो बुरा हाल है और युवा भटकता जा रहा है। गांव का युवा सन्नी कहने लगा कि कोई काम नहीं है, मैंने तो हाथ का काम सीखकर डेरा बाबा नानक में छोटी सी दुकान खोल ली है, आगे देखो क्या होता है लेकिन यहां के युवाओं को न तो शिक्षा मिल रही है और न ही नौकरी।

विज्ञापन


गांव पखोके महमार के रहने वाले अमर इकबाल सिंह का कहना है कि सच्चाई सुनो... यहां आसपास 200 गांव हैं और एक भी कॉलेज नहीं है। लड़कियों को जमा दो की शिक्षा के बाद उच्च शिक्षा के लिए 50 किलोमीटर दूर अमृतसर कॉलेज जाना पड़ता है या 40 किलोमीटर दूर बटाला में। शाम को पांच बजे के बाद बस नहीं चलती। 20 साल से सरकारी नौकरी नहीं निकली, गांव में अब फौज में भी भरती बंद हो गई है। ऐसे में युवाओं का भविष्य अंधकार में है। धंधा तो सिर्फ खेतीबाड़ी का ही रह गया, उसमें भी प्रति व्यक्ति जमीन कम होती जा रही है। 

लगातार खराब हो रहे हालात

गांव के सरपंच के पिता अमर सिंह का कहना है कि एह ता वाहेगुरू दी मेहर है कि सब ठीकठाक चल रेहा है.. पर हालात बहुत खराब हो चुके ने... बेरोजगारी बढ़ती जा रही है और साथ ही महंगाई आसमान छू रही है। यहां का युवा शिक्षा से वंचित रहता जा रहा है.. इसलिए ही वह भटक रहा है। हमारी तो कई पीढ़ियां इस गांव में निकल गईं, यह आठवीं पीढ़ी है लेकिन दिन प्रतिदिन हालात खराब ही हो रहे हैं।

विज्ञापन
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें