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कहां गया पंजाब का हस्तशिल्प: अब फुर्सत में फुलकारी नहीं बनाती महिलाएं, खेस-पंजा दरी भी बिसराए; क्या है कारण

Mon, 19 May 2025 08:47 AM IST
निवेदिता वर्मा नितिन उपमन्यु, अमर उजाला, चंडीगढ़

सार

जब भी पंजाब का जिक्र होता है, तो आम तौर पर यहां के खानपान और खेतीबाड़ी की ही चर्चा होती है, लेकिन पंजाब में हस्तशिल्प कलाओं का भी अनमोल खजाना है। यहां की सांस्कृतिक विरासत इतनी समृद्ध है कि इस पर इतराए बिना नहीं रहा जा सकता। इनका जादू आज भी बरकरार है, लेकिन वक्त के साथ-साथ ये कलाएं लुप्त होती जा रहीं हैं। 
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पंजाब में विलुप्त हो रही पुरातन कलाएं - फोटो : संवाद
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विस्तार
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39 साल के कमलजीत मठारू अपने परिवार में छठी पीढ़ी के सदस्य हैं, जो लकड़ी पर पच्चीकारी की दुर्लभ कला को आगे बढ़ा रहे हैं। होशियारपुर के रहने वाले कमलजीत इस बात से थोड़ा मायूस हैं कि जिस कला को सीखने के लिए कभी कारीगरों की भीड़ जमा रहती थी, आज ढूंढने पर भी लोग नहीं मिलते। उनके पिता नेशनल अवॉर्डी रूपन मठारू भी 61 साल की उम्र में इस कला के संवर्धन में लगे हैं। एक समय था जब वे दिन में आठ से 10 घंटे यह काम किया करते थे, क्योंकि तब इस कला से निर्मित उत्पादों की भरपूर मांग थी। उनकी बनाई कृतियां हाथों हाथ बिकती थी। हालांकि मांग तो अब भी है, लेकिन इस कला को सरकार की तरफ से प्रोत्साहन नहीं मिल रहा।

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कमलजीत कहते हैं कि नई पीढ़ी इस कला के प्रति अधिक रुचि नहीं दिखा रही। उनमें इस कला काे सीखने का धैर्य नहीं है। वह रातों रात माहिर बन कर पैसे कमाना चाहते हैं, जबकि इस कला में निपुण होेने के लिए लंबी साधना की जरूरत है। वह बताते हैं कि होशियारपुर की पहचान कभी लकड़ी पर हाथी दांत की कारीगरी के लिए थी। फर्नीचर, सिंगार बॉक्स, फोटो फ्रेम से लेकर खिलौनों तक की भारी मांग थी। यह कला अब संकट में है। हाथी दांत पर प्रतिबंध लगने के बाद गिरती मांग के कारण इसे डाइंग क्राफ्ट की सूची में डाल दिया गया।
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कमलजीत भी राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता हैं। उनके परिवार में यह कला उनके दादा-परदादा के समय से आगे बढ़ रही है। पहले होशियारपुर में ही इस कला के पांच से छह हजार कारीगर थे, जो अब 70 के करीब रह गए हैं। प्रोत्साहन की कमी के अलावा कारीगरों को प्रशिक्षण की कमी भी इस कला के प्रति कम होती रुचि का कारण है। ज्यादातर कारीगर शिक्षित नहीं हैं। वे नई चीजें नहीं बना पा रहे। पहले शिल्पी अपने घर में काम करते थे। अब यह काम बंद हो चुका है। पहले सरकार छह माह का प्रशिक्षण व स्टाइपेंड देती थी, अब इसे दो माह कर दिया गया है। इस कला को सीखने के लिए दो माह बहुत कम हैं।

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500 से घर कर 30 रह गई बर्तन बनाने वाले परिवारों की संख्या

अमृतसर के जंडियाला गुरु की पहचान आज भी हाथ से पीतल, तांबे और कांसे के बर्तन बनाने के लिए है। तांबे और पीतल की चादरों को पीटकर बर्तन बनाने की कला यहां काफी पुरानी है। भारत के विभाजन के बाद यह कारोबार खूब फला-फूला, लेकिन धीरे-धीरे स्टील के बर्तनों के बढ़ते चलन के कारण इस कारोबार पर संकट के बादल मंडराने लगे।

स्थिति यहां तक पहुंच गई कि इस व्यवसाय से जुड़े परिवारों की संख्या 500 से घटकर 30 रह गई। मई 2018 में यूनेस्को ने इस कला को सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया। अब इसके संरक्षण के लिए काम किया जा रहा है। स्टील और एल्युमीनियम के बर्तनों से प्रतिस्पर्धा के बीच पिछले कुछ वर्षों से उत्पादों की मांग में भारी गिरावट आई है। इस कला से जुड़े दलजीत सिंह कहते हैं, हम अपने डिजाइन में लगातार बदलाव कर रहे हैं। हमने चाय के सेट, फूलदान, मसाला बॉक्स, डिनर सेट आदि जैसे कई उत्पाद तैयार किए हैं, जिन्हें पसंद किया जा रहा है। इन उत्पादों की कीमत 200 रुपये से लेकर 8000 रुपये के बीच है।




इन पारंपरिक बर्तनों को बनाने के लिए, पीतल और तांबे के स्क्रैप को पहले एक बड़ी भट्ठी में पिघलाया जाता है। फिर पिघली हुई धातु को लोहे के सांचों में निकाला जाता है और ठंडा होने दिया जाता है। फिर धातु की डली को हाथ के रोलर का उपयोग करके चपटी प्लेटों में रोल किया जाता है।

मशीनी जुत्ती की कीमत से प्रतिस्पर्धा मुश्किल

पंजाब के पटियाला और फाजिल्का में हाथ से चमड़े की जुत्ती बनाने का काम वर्षों से हो रहा है, लेकिन मशीनों से बनने वाली जुत्ती हाथ से बनी जुत्ती के मुकाबले काफी सस्ती पड़ती है। फाजिल्का के कारीगर करतार सिंह कहते हैं कि इन जुत्तियों की विशेषता है कि इनका ऊपरी भाग बंद होता है। इन्हें आसानी से पहना जा सकता है। इनकी विशिष्टता साज-सज्जा और कढ़ाई से आती है। यह पीढ़ियों से चली आ रही कला है। पारंपरिक पंजाबी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। आज की आधुनिक दुनिया में भी इनका महत्वपूर्ण स्थान है। करतार बताते हैं मशीनों की मदद से रातों-रात ऑर्डर पूरे कर दिए जाते हैं, लेकिन हाथ से बनी जुत्ती की बात ही और है। सरकार यदि प्रोत्साहन दे तो यह कला रोजगार का बड़ा साधन बन सकती है।

फुलकारी को नहीं मिल रहे कद्रदान

फुलकारी भारत और पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र में महिलाओं द्वारा की जाने वाली एक पारंपरिक कढ़ाई की कला है। चटख रंग के धागों से कपड़े पर कढ़ाई की कला में पारंगत होने में महीनों लग जाते हैं। इस कला के कद्रदान भी कम हुए हैं। हालांकि सीखने का उत्साह बरकरार है, लेकिन इससे मिलते जुलते दुपट्टे, शॉल सूट आदि काफी सस्ते मिल जाते हैं, इसलिए लोग उन्हें प्राथमिकता देने लगते हैं। असली फुलकारी की पहचान कम लोगों को ही होती है। इससे धागों में इस्तेमाल होने वाले रंग भी प्राकृतिक होते हैं। पारंपरिक रूप से पलाश के फूलों, मजीठ की जड़ या बबूल की छाल जैसे स्रोतों से तैयार प्राकृतिक रंगों का उपयोग किया जाता है। अमृतसर की रूपिंदर कौर कहती हैं कि उनके पास इस कला को सीखने वालों की संख्या में कमी है, जो चिंता की बात है।

परांदों में इस्तेमाल होने वाली सामग्री हुई महंगी

परांदे बनाने की शुरुआत पंजाब में बहुत पहले हुई थी और पटियाला परांदे बनाने के सबसे पुराने केंद्रों में से एक है। पटियाला के शाही परिवारों में महारानी और महिलाओं ने अपनी चोटी के निचले सिरे को समृद्ध सोने और बहुरंगी धागों, रिबन और मोतियों से सजाने के लिए इनका इस्तेमाल शुरू किया था। धीरे-धीरे यह आम चलन में आ गया। पंजाब के गानों में भी परांदों का जिक्र आम तौर पर मिल जाता है। इसे बनाने वाले कलाकारों का कहना है कि इसमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री काफी महंगी हो गई है, इसलिए इनका रुझान कम हो रहा है।

कम हो रहा खेस बनाने का चलन

गांवों में कई पीढ़ियों से महिलाएं खेस बुनने का काम करती रहीं हैं। इनका इस्तेमाल ओढ़नी के तौर पर किया जाता है, लेकिन अब इनका चलन भी कम हो रहा है। बाजार में चीन से बनीं बेहद सस्ती ओढ़नी उपलब्ध हैं। पुराने समय में इनकी बुनाई चटाई के तौर पर होती थी। बाद में सूती कंबलों की मांग को पूरा करने के लिए इनका इस्तेमाल होने लगा। अब इक्का-दुक्का घरों में ही इनकी बुनाई का काम होता है।

पंजा दरी की जगह ली प्लास्टिक की चटाइयों ने

सियालकोट से आकर जालंधर के नकोदर में बसे इनका निर्माण शुरू किया था। आज भी मोगा, बटाला, लुधियाना और अन्य स्थानों पर इनका उत्पादन होता है। कपास के ताने, जूट, ऊन और कभी-कभी अपरिष्कृत रेशम के बाने से बनी दरी घरों में आम है। पंजा दरी को तीखे रंगों और पैटर्न के लिए जाना जाता। इन्हें करघे पर पंजे का उपयोग करके बुना जाता है। इनकी जगह अब प्लास्टिक की चटाइयों ने ले ली है।

लकड़ी के खिलौनों पर भारी पड़ रहे चीनी खिलौने

जानवरों और पारंपरिक पात्रों को दर्शाते लकड़ी के खिलौनों पर अब चीनी खिलाने भारी पड़ने लगे हैं। प्रत्येक खिलौने में एक कहानी होती है, जो न केवल मनोरंजन के लिए बल्कि पंजाबी संस्कृति और मूल्यों को संरक्षित करने के साधन के रूप में भी काम आते हैं। ये खिलौने पंजाब की कलात्मक विरासत को भी सहेजे हुए हैं। प्लास्टिक से बने सस्ते चीनी खिलौनों के मुकाबले ये आज भी अधिक आकर्षित हैं।
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