इसमें डिजिटल रूप से दिखाया गया है कि किस तरह से गुरु तेग बहादुर जी ने इस्लाम कबूल न करके अपनी शहादत दी और कैसे भाई जैता जी गुरु जी का शीश यहां लेकर आए और उसे श्री गुरु गोबिंद सिंह जी को भेंट किया। इसके बाद ही उन्होंने रंगरेटे गुरु के बेटे की उपाधि दी गई।