पंजाब में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर सभी सियासी दलों के रणनीतिकार इन दिनों सूबे के सियासी समीकरणों के मंथन में व्यस्त हैं। इस दौरान क्या प्रभावशाली समीकरण बन सकते हैं और कैसे इन्हें अपने पक्ष में करते हुए चुनावी माहौल बनाया जा सकता है, इस बारे में गहन समीक्षा की जा रही है। इसका मकसद दलों द्वारा सरकार बनाने के लिए बहुमत के आंकड़े तक पहुंचना है।
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चुनाव के दौरान भले ही पंजाब के कुछ कॉमन मुद्दे रहेंगे, मगर सभी सियासी रणनीतिकार सूबे के तीन प्रमुख क्षेत्रों मालवा, माझा व दोआबा के लिए अलग-अलग चुनावी रणनीति भी तैयार करेंगे। दरअसल, इन क्षेत्रों के मतदाताओं के मिजाज पर यहां के स्थानीय मुद्दों का खासा असर पड़ता है। दूसरी ओर, सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी को समीकरणों से ज्यादा अपने विकास मॉडल पर भरोसा है।
आप के प्रदेशाध्यक्ष व कैबिनेट मंत्री अमन अरोड़ा कहते हैं कि साल 2022 के चुनाव में हमारे पास पंजाबियों को दिखाने के लिए आप शासित सरकार का दिल्ली मॉडल था, मगर आज हम मतदाताओं के सामने पंजाब का विकास मॉडल पेश करेंगे। इसी मॉडल पर जनता फिर मुहर लगाएगी और यह सभी समीकरणों पर भारी पड़ेगा।
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मालवा : किसान-किसानी के मसले हावी
पंजाब में कुल 117 में से 69 विधानसभा सीटें मालवा क्षेत्र में आती हैं। कहा जाता है कि इसी क्षेत्र से उठी सियासी लहर पंजाब में सत्ता का रुख तय करती है। लिहाजा मालवा को सत्ता की कुंजी भी कहा जाता है। सूबे का सबसे बड़ा क्षेत्र है और 15 जिलों में फैला हुआ है। पंजाब के अधिकतर मुख्यमंत्री (प्रकाश सिंह बादल, कैप्टन अमरिंदर सिंह, भगवंत मान) इसी क्षेत्र से रहे हैं इसलिए सभी दल मालवा में बेहतर प्रदर्शन के लिए खास रणनीति बनाने में जुट चुके हैं।
साल 2022 के चुनावों की स्थिति देखें तो आप ने मालवा में एकतरफा जीत दर्ज की थी। यहां 69 में से आप को 66, कांग्रेस को 2 व शिरोमणि अकाली दल को एक सीट मिली थी। किसान और किसानी से जुड़े मसले, भूजल और कैंसर बेल्ट, बेरोजगारी व युवाओं का पलायन इस क्षेत्र के प्रमुख मुद्दे हैं।
माझा : पंथक मुद्दे असरदार
अमृतसर, गुरदासपुर, तरनतारन और पठानकोट का इलाका माझा क्षेत्र कहा जाता है। यहां कुल 25 विधानसभा सीटें आती हैं। माझा को पंजाब की पंथक और राजनीतिक राजधानी माना जाता है। भारत-पाकिस्तान सीमा से सटे होने के कारण यह इलाका राष्ट्रीय सुरक्षा, तस्करी और रक्षा रणनीति की दृष्टि से बेहद संवेदनशील है। साल 2022 में यहां 25 में से आप ने 16 सीटें, कांग्रेस ने 7, शिअद-भाजपा ने 1-1 सीटें जीती थीं। इस क्षेत्र में आप के समक्ष अपने पुराने प्रदर्शन को दोहराने, जबकि कांग्रेस और शिअद को इस पारंपरिक गढ़ में पंथक और ग्रामीण वोट बैंक को वापस पाने की चुनौती रहेगी। पठानकोट और अमृतसर जैसे शहरी इलाकों में हिंदू-सिख समीकरण साधकर पार्टियां जनाधार जुटाने की तैयारी में हैं। नशाखोरी व सीमा पार तस्करी, सीमावर्ती किसानों व व्यापारियों की समस्याएं यहां प्रमुख मुद्दे हैं।
दोआबा : दलित व एनआरआई साधने पर जोर
सतलुज और ब्यास नदियों के बीच का भूभाग दोआबा सूबे की राजनीति में खास स्थान रखता है। चार जिलों जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और नवांशहर तक फैले इस क्षेत्र में कुल 23 विधानसभा सीटें हैं। साल 2022 में आप ने यहां 10, कांग्रेस ने 9, भाजपा ने 2 व शिअद और बसपा ने 1-1 सीट जीती थीं। इस क्षेत्र में दलित और एनआरआई पंजाबी खासे असरदार रहते हैं। इसलिए दलों का जोर यहां इन दोनों वर्गों को साधने पर रहेगा। दोआबा में दलित वोट बैंक का ध्रुवीकरण, एनआरआई और आव्रजन नीतियां, अवैध खनन और औद्योगिक व बुनियादी विकास सरीखे मुद्दे चुनाव में खासे उछाले जाते रहे हैं।