हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी पर लगे अपराधों में दस साल या उससे अधिक सजा का प्रावधान नहीं है। इसलिए उसे धारा 84(4) के तहत घोषित अपराधी ठहराना कानून के अनुरूप नहीं था। अदालत ने उद्घोषणा की प्रक्रिया में भी खामियां पाईं। मजिस्ट्रेट के आदेश में यह दर्ज नहीं था कि आरोपी गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार हुआ है या छिप रहा है।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि जिन अपराधों में दस साल या उससे अधिक की सजा का प्रावधान नहीं है, उनमें आरोपी को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (बीएनएसएस) की धारा 84(4) के तहत घोषित अपराधी नहीं ठहराया जा सकता। ऐसे मामलों में अधिकतम उसे फरार व्यक्ति घोषित किया जा सकता है।
विज्ञापन
न्यायमूर्ति शालिनी सिंह नागपाल ने यह टिप्पणी करते हुए खरड़ अदालत का आदेश रद्द कर दिया। निचली अदालत ने धोखाधड़ी और आपराधिक विश्वासघात के मामले में आरोपी को घोषित अपराधी करार दिया था।
मामला वर्ष 2023 में खरड़ थाने में दर्ज धोखाधड़ी और आपराधिक साजिश की एफआईआर से जुड़ा है। आरोपी पर आईपीसी की धारा 406, 420 और 120-बी के तहत केस दर्ज था। हाईकोर्ट ने 27 नवंबर 2024 को उसे नियमित जमानत दी थी। 12 मार्च 2026 को सुनवाई पर पेश न होने के बाद उसे 24 मार्च और 16 अप्रैल को पेश होने के नोटिस दिए गए। लगातार गैरहाजिर रहने पर 16 अप्रैल को जमानत रद्द कर गैर-जमानती वारंट जारी किए गए। पांच जून को उद्घोषणा की प्रक्रिया शुरू हुई और 29 सितंबर को उसे घोषित अपराधी करार दे दिया गया।
विज्ञापन
हाईकोर्ट ने पाया कि आरोपी पर लगे अपराधों में दस साल या उससे अधिक सजा का प्रावधान नहीं है। इसलिए उसे धारा 84(4) के तहत घोषित अपराधी ठहराना कानून के अनुरूप नहीं था।
अदालत ने उद्घोषणा की प्रक्रिया में भी खामियां पाईं। मजिस्ट्रेट के आदेश में यह दर्ज नहीं था कि आरोपी गिरफ्तारी से बचने के लिए फरार हुआ है या छिप रहा है। उसके निवास क्षेत्र में उद्घोषणा सार्वजनिक रूप से पढ़कर सुनाए जाने का प्रमाण भी नहीं था। अदालत ने कहा कि केवल नोटिस चस्पा करना पर्याप्त नहीं है, कानून में तय सभी प्रक्रियाओं का पालन जरूरी है। इसके अलावा, निर्धारित पांच अगस्त की तारीख के बाद 29 सितंबर तक सुनवाई टालने पर नई उद्घोषणा भी जारी नहीं की गई।