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200 रुपये की रिश्वत का दाग 21 साल बाद धुला:  हाईकोर्ट ने क्लर्क किया बरी, लोन लेकर भैंस खरीदने का मामला

Mon, 14 Sep 2026 09:42 PM IST
शाहिल शर्मा अमर उजाला ब्यूरो, चंडीगढ़

सार

साल 2005 में आरोपी को दोषी मानते हुए निचली अदालत ने दो साल कैद और दो हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने इस फैसले को पलटते हुए सरकारी क्लर्क को बरी किया है। 
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हाईकोर्ट का फैसला - फोटो : सांकेतिक तस्वीर
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विस्तार
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पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 200 रुपये रिश्वत लेने के 21 साल पुराने मामले में दोषी ठहराए गए पूर्व सरकारी क्लर्क को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि रिश्वत की रकम बरामद होना अपने आप में दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। खासकर तब जब रिश्वत मांगने का आरोप ही संदेह के घेरे में हो। हाईकोर्ट ने निचली अदालत की दोषसिद्धि और दो साल कैद व दो हजार रुपये जुर्माने की सजा रद्द कर दी।
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शिकायतकर्ता ने वर्ष 2000 में भैंस खरीदने के लिए पंजाब अनुसूचित जाति भूमि विकास एवं वित्त निगम से ऋण के लिए आवेदन किया था। फरवरी 2001 तक सूचना नहीं मिलने पर वह निगम कार्यालय पहुंचा। बैंक से जानकारी लेने पर उसे ऋण आवेदन का डिस्पैच नंबर उपलब्ध कराने को कहा गया। शिकायतकर्ता के अनुसार 15-20 दिन बाद कार्यालय पहुंचने पर आरोपी क्लर्क ने डिस्पैच नंबर देने के बदले 200 रुपये रिश्वत मांगी।
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100-100 रुपये के दो नोट हुए थे बरामद
शिकायतकर्ता ने सतर्कता ब्यूरो से संपर्क किया। ब्यूरो ने जाल बिछाया और क्लर्क को 100-100 रुपये के दो नोट लेते हुए पकड़ने का दावा किया। नोट उसकी पतलून की बाईं जेब से बरामद हुए। वर्ष 2005 में निचली अदालत ने उसे दो साल कैद और दो हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी।

आरोपी के पास लंबित काम ही नहीं था: हाईकोर्ट
अपील पर सुनवाई के दौरान आरोपी के वकील ने शिकायतकर्ता के परिवार से पुरानी रंजिश का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि शिकायतकर्ता यह स्पष्ट नहीं कर सका कि रिश्वत किस तारीख और समय मांगी गई थी। अदालत ने पाया कि ऋण का मामला पहले ही स्टेट बैंक ऑफ पटियाला भेजा जा चुका था और आरोपी के पास कोई लंबित काम नहीं था जिसके लिए वह रिश्वत मांगता। हाईकोर्ट ने कहा कि जब रिश्वत की मांग का साक्ष्य संदिग्ध हो तो केवल रकम की बरामदगी के आधार पर दोषसिद्धि कायम नहीं रखी जा सकती।
 
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