पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट ने 200 रुपये रिश्वत लेने के 21 साल पुराने मामले में दोषी ठहराए गए पूर्व सरकारी क्लर्क को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि रिश्वत की रकम बरामद होना अपने आप में दोषसिद्धि के लिए पर्याप्त नहीं है। खासकर तब जब रिश्वत मांगने का आरोप ही संदेह के घेरे में हो। हाईकोर्ट ने निचली अदालत की दोषसिद्धि और दो साल कैद व दो हजार रुपये जुर्माने की सजा रद्द कर दी।
शिकायतकर्ता ने वर्ष 2000 में भैंस खरीदने के लिए पंजाब अनुसूचित जाति भूमि विकास एवं वित्त निगम से ऋण के लिए आवेदन किया था। फरवरी 2001 तक सूचना नहीं मिलने पर वह निगम कार्यालय पहुंचा। बैंक से जानकारी लेने पर उसे ऋण आवेदन का डिस्पैच नंबर उपलब्ध कराने को कहा गया। शिकायतकर्ता के अनुसार 15-20 दिन बाद कार्यालय पहुंचने पर आरोपी क्लर्क ने डिस्पैच नंबर देने के बदले 200 रुपये रिश्वत मांगी।