समय के साथ-साथ अब युद्ध की स्थितियां भी बदलती जा रही हैं। परंपरागत जंग से इतर अब साइबर वॉरफेयर के साथ-साथ हाईब्रिड वॉरफेयर का खतरा भी बढ़ रहा है। यह युद्ध का ऐसा तरीका है जिससे सैन्य बलों के समक्ष एक अलग ही चुनौती होती है, जिससे निपटने के लिए सैन्य बलों को भी अपग्रेड करने पर खासा जोर दिया जा रहा है।
इसके लिए सेंटर फॉर लैंड वॉरफेयर स्टडीज व सोसाइटी ऑफ इंडियन डिफेंस मैन्युफैक्चरर्स अपने-अपने स्तर पर भरसक सहयोग कर रहे हैं। उधर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी व रक्षामंत्री राजनाथ सिंह भी भविष्य में युद्ध के बदलते तरीकों के मद्देनजर सैन्य बलों को तैयार रहने के लिए कह चुके हैं। हाईब्रिड खतरों से कैसे निपटा जाए, इसके लिए दक्षिण पश्चिमी कमान भी पूरी तरह गंभीर है।
कमान के एक आला सैन्य अधिकारी ने बताया कि कमान का फोकस अगली पीढ़ी के युद्ध के लिए सेना की तकनीकी प्रगति पर है। आधुनिक और भविष्य के संघर्षों संबंधी चुनौतियों से निपटने के लिए सैन्य बलों को एडॉप्टिव डिफेंस और इनोवेशन की तत्काल आवश्यकता है। उन्होंने बताया कि हाईब्रिड खतरों का मुकाबला करने के लिए आज गूढ़ क्षमताओं और घातक स्वायत्त हथियार प्रणालियों को विकसित करना बेहद जरूरी है। इसके लिए एआई संचालित सिस्टम, हाइपरसोनिक हथियार, डायरेक्टिड एनर्जी हथियारों, एडवांस साइबर सिस्टम और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम विकसित करना है।
चरम पर होगा तकनीक का इस्तेमाल
रक्षा विशेषज्ञ मेजर जनरल चंद्र प्रकाश (वेटरन) बताते हैं कि युद्ध के परंपरागत तरीकों से हाईब्रिड वॉरफेयर अलग है। इसमें तकनीक का इस्तेमाल चरम पर होगा। सैटेलाइट और मानव रहित हथियार प्रणालियों की अहम भूमिका रहेगी। ऑपरेशन सिंदूर में इस्तेमाल की गई तकनीक भी इसी वॉरफेयर का एक छोटा सा उदाहरण थी। भारतीय सेना ने पाकिस्तान के रडार सिस्टम को फेल कर उनके सैन्य अड्डों को निशाना बनाया और उन्हें पता तक नहीं चला। फ्यूचर वॉर के लिए ऐसी ही तकनीकों को और अपग्रेड किया जा रहा है। उनके अनुसार हाइब्रिड वॉर में युद्ध के दौरान सामने एक अदृश्य दुश्मन होता है, जो स्पेस वॉर, साइबर अटैक और डिसइन्फॉर्मेशन कैंपेन से भ्रम फैलाना इत्यादि तरीकों के जरिये देश पर हमला करता है। यह नए दौर के युद्ध की नई प्रकृति है। इसमें गोलियों से कम तकनीक से जंग पर ज्यादा जोर दिया जाता है।