मेजर जनरल वेटरन तेजपाल सिंह बक्शी और सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की प्रतिमा।
- फोटो : अजय वर्मा
एक पलटन ने झांसा दिया, खेत्रपाल ने खेल किया
बसंतर की लड़ाई में हमारा टारगेट पाकिस्तान का जरपाल क्षेत्र था जिसे भारतीय सेना ने अपने कब्जे में ले लिया था। अब पाकिस्तान के काउंटर अटैक का इंतजार किया जा रहा था। मेजर जनरल बख्शी बताते हैं कि इस दौरान योजना के तहत उनकी एक पलटन ने दुश्मन को झांसा दिया जबकि असली खेल सेकंड लेफ्टिनेंट अरुण खेत्रपाल की पलटन ने किया। एक पलटन के कुछ जवान बसंतर नदी पार कर दूसरे क्षेत्र से घुसपैठ कर रहे थे। पाकिस्तानी फाैज को लगा कि हमला उसे क्षेत्र से होगा। पाकिस्तानी उसी ओर पूरी तरह सक्रिय हो गए। दूसरी ओर, अरुण अन्य मोर्चे पर अपनी टैंक रेजिमेंट के साथ दुश्मनों पर टूट पड़ा। जरपाल भारतीय सेना के कब्जे में आ चुका था। जरपाल से जवान एक पाकिस्तान जीप को विजेता ट्राॅफी के रूप में लेकर लाैटे थे, जिसे ‘जरपाल क्वीन’ के नाम से जाना जाता है।
टैंक से निकाले नाले में फंसे गोला बारूद के ट्रक
बसंतर की लड़ाई छिड़ चुकी थी। मेजर जनरल बख्शी अपनी पलटन के साथ गोला-बारूद से भरे दो ट्रक लेकर बसंतर के पास एक नाला पार कर रहे थे तभी नाले के दलदल में दोनों ट्रक फंस गए। मेजर जनरल कहते हैं कि उन्हें चिंता इस बात की थी यहीं फंसे रहे गए तो जवानों तक गोला बारूद कैसे पहुंचेगा। तभी नदी पार कर चुके उनके दोस्त अरुण खेत्रपाल ने उन्हें देख लिया और अपने टैंक से ही खींचकर दोनों ट्रकों को बाहर निकालकर उन्हें आगे रवाना किया।