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विश्व रेडियो दिवस पर विशेष: मोबाइल बन गया हर मनोरंजन का राजा... और बज गया रेडियो का बाजा

Sun, 13 Feb 2022 04:03 PM IST
निवेदिता वर्मा रविंदर शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, अमृतसर (पंजाब)

सार

मजीठमंडी के रहने वाले संजीव कुमार अरोड़ा ने बताया कि पहले हमारे युवा रेडियो रिपेयर की ट्रेनिंग का कोर्स करते थे, लेकिन अब यह सब खत्म हो चुका है। विद्यार्थी भी रेडियो के क्षेत्र में कॅरिअर बनाते थे। रेडियो स्टूडियो में एंकरिंग से लेकर खेतीबाड़ी, लोकगीत सहित कई क्षेत्रों में यह रोजगार प्रदान करता था।
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अमृतसर में जानकारी देते भारत रेडियो के मालिक। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
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विस्तार
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कभी दौर था जब रेडियो लोगों के मनोरंजन का एकमात्र साधन हुआ करता था। पुराने जमाने में लोग इस पर रागिनी, समाचार, पुराने फिल्मी गीत, नाटकों का मंचन, अलग-अलग मुद्दों पर माहिरों की बहस, प्रादेशिक भाषाओं के विभिन्न कार्यक्रम सुनकर आनंदित होते थे। मगर आधुनिकता के दौर में मनोरंजन साधन का कहे जाने वाले रेडियो का बाजा बज चुका है। दूसरे शब्दों में कहें तो रेडियो जगत अब अपने अंतिम दौर में पहुंच चुका है। अमृतसर के हाल बाजार सहित अन्य बाजारों में कभी रेडियो की कई दुकानें हुआ करती थीं, लेकिन आज अमृतसर में 1948 में शुरू हुई भारत रेडियो ही एकमात्र दुकान बची है। यह मन की बात तक ही सीमित हो गया है और वह भी टीवी पर सुनी जाती है। 

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हाल बाजार स्थित भारत रेडियो के मालिक ललित कुमार ने बताया कि उनके पिता लोक नाथ और ताया राम प्रताप ने 1948 में रेडियो की दुकान शुरू की थी। तब लोगों में रेडियो के लेकर बहुत क्रेज था। गलियों और बाजारों के नुक्कड़ चौराहों पर लोग इकट्ठे होकर रेडियो के कार्यक्रम सुनते और उस पर बहस भी करते थे। लेकिन अब टीवी, मोबाइल इंटरनेट, व्हाट्सएप, फेसबुक, यूट्यूब जैसी तकनीकी ने रेडियो को लगभग खत्म कर दिया है।

मोबाइल के आते ही खत्म होने लगा था रेडियो : सूरज

रेडियो मैकेनिक सूरज कुमार ने बताया कि वे 40 वर्षों से रेडियो ठीक करने का काम कर रहे हैं। तब बहुत कम लोगों के घरों में टेलिविजन, वे भी ब्लैक एंड व्हाइट हुआ करते थे। हर घर में रेडियो होता था, लेकिन करीब 25 साल पहले मोबाइल सेवा शुरू हुई। पहले तो मोबाइल पर बात ही हो पाती थी, लेकिन आज के युग के मोबाइल पर लोग बात ही नहीं करते, बल्कि उनके मनोरंजन का हर साधन मोबाइल फोन में मौजूद है। मोबाइल के आते ही रेडियो के खात्मे का सिलसिला शुरू हो गया था। अब तो हालात ये हैं कि लोगों के घरों में रेडियो ढूंढकर नहीं मिलते। यह बात अलग है कि मोबाइल, टीवी और कारों पर रेडियो के फीचर मौजूद हैं।

रोजगार का जरिया भी हुआ करता था : अरोड़ा

मजीठमंडी के रहने वाले संजीव कुमार अरोड़ा ने बताया कि पहले हमारे युवा रेडियो रिपेयर की ट्रेनिंग का कोर्स करते थे, लेकिन अब यह सब खत्म हो चुका है। विद्यार्थी भी रेडियो के क्षेत्र में कॅरिअर बनाते थे। रेडियो स्टूडियो में एंकरिंग से लेकर खेतीबाड़ी, लोकगीत सहित कई क्षेत्रों में यह रोजगार प्रदान करता था। कई तरह के खास कार्यक्रम बनाकर पेश किए जाते थे। कई ऐसे कार्यक्रम भी होते थे जो सप्ताह में एक या दो दिन आते थे और लोग उन्हें सुनने के लिए इंतजार करते थे। अब ये सब बीती बातें रह गई हैं। 

चौपाल पर इकट्ठे होकर सुनते थे कार्यक्रम : शिव सिंह

सीमांत गांव धनोए कलां के 82 वर्षीय शिव सिंह ने बताया कि वर्षों पहले जब मनोरंजन का साधन केवल रेडियो हुआ करता था। गांव से शहर तक रेडियो पर मेरी पसंद, चित्रपट संगीत, विविध भारती से प्रसारित होने वाले लोकप्रिय कार्यक्रम सुनने के लिए लोग बेताब रहते थे। उन्होंने बताया कि किसानों के लिए पेश किए जाने वाले कार्यक्रम गांवों में खास तौर पर सुने जाते थे। इस तरह के कार्यक्रम के समय लोग गांव की चौपाल पर इकट्ठे होकर खेती करने संबंधी जानकारी हासिल करते थे। लेकिन समय बदला और आधुनिकता के दौर में मनोरंजन के साधन भी बदल गए।

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