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पंजाब में डगमगा रही शिअद की राह: माझा जोन में कमजोर हो रही पकड़, टकसाली नेताओं के साथ छोड़ने से बढ़ी चुनौती

Wed, 05 Aug 2026 03:28 PM IST
शाहिल शर्मा हरीश शर्मा, अमृतसर

सार

माझा जोन में अकाली दल की स्थिति लगातार कमजोर हो रही है जिससे आने वाले विधानसभा चुनाव में पार्टी की मुश्किलें बढ़ सकती हैं। 
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शिअद - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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पंजाब में 2027 विधानसभा चुनाव से पहले शिरोमणि अकाली दल (बादल) को लगातार राजनीतिक झटके लग रहे हैं। पार्टी के कई वरिष्ठ और टकसाली नेता संगठन छोड़कर अन्य दलों में शामिल हो गए हैं। इससे खासकर माझा जोन में अकाली दल की पकड़ कमजोर होने की चर्चा तेज हुई है।
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हाल के महीनों में पूर्व राज्यसभा सदस्य राजमोहन सिंह मजीठिया, हेमिंदर सिंह मजीठिया और सुखदीप सिंह मजीठिया आम आदमी पार्टी में शामिल हुए। इससे पहले पूर्व मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा भी अकाली दल छोड़कर आप में चले गए थे। राजमोहन सिंह मजीठिया का जाना माझा क्षेत्र में अकाली दल के लिए बड़ा झटका माना गया। दो दिन पहले पूर्व विधायक दलबीर सिंह वेरका और एसजीपीसी सदस्य बिक्रमजीत सिंह कोटला भी अकाली दल (वारिस पंजाब दे) में शामिल हुए। 
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मनप्रीत सिंह अयाली ने भी अकाली दल (बादल) से अलग होकर अकाली दल (वारिस पंजाब दे) का दामन थामा। दलबीर सिंह वेरका ने बिक्रम सिंह मजीठिया को पार्टी छोड़ने का मुख्य कारण बताया। राजनीतिक विश्लेषक जगदीप सिंह ने कहा कि इस पलायन से अकाली दल के संगठनात्मक ढांचे पर असर पड़ रहा है। उन्होंने कहा कि कई जिलों में पुराने नेताओं के जाने से पार्टी को नए सिरे से संगठन खड़ा करने की चुनौती मिल रही है। 

अकाली दल नेतृत्व का दावा है कि संगठन को मजबूत करने के लिए नए चेहरों को जिम्मेदारी दी जा रही है और कार्यकर्ताओं से संवाद किया जा रहा है। माझा जोन में अकाली दल की स्थिति लगातार कमजोर हो रही है। राजमोहन सिंह मजीठिया, हेमिंदर सिंह मजीठिया और सुखदीप सिंह मजीठिया ने आम आदमी पार्टी का रुख किया।पूर्व मंत्री सुरजीत सिंह रखड़ा भी आप में शामिल हो गए। इन नेताओं के जाने से माझा क्षेत्र में पार्टी की पकड़ ढीली हुई है।

संगठनात्मक ढांचा प्रभावित हुआ
जगदीप सिंह के अनुसार, लगातार पलायन से अकाली दल का संगठनात्मक ढांचा प्रभावित हुआ है। तलबीर सिंह गिल अब मजीठा हलके में बड़ी चुनौती बन गए हैं। 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले यह राजनीतिक फेरबदल अकाली दल के लिए एक बड़ी परीक्षा है। यदि पार्टी असंतुष्ट नेताओं का भरोसा दोबारा हासिल नहीं कर पाती तो उसकी राह कठिन हो सकती है।
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