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Ground Report: बेरोजगारी और अशिक्षा का असर... विकास की दौड़ में बहुत पीछे छूट गए हैं पंजाब के सीमांत गांव

Thu, 19 May 2022 11:30 AM IST
निवेदिता वर्मा रविंदर शर्मा, संवाद न्यूज एजेंसी, अमृतसर (पंजाब)

सार

गांवों के लोगों का कहना है कि यदि युवाओं को रोजगार और शिक्षा के उचित मौके मिलें तो कोई वजह नहीं कि युवा गैरकानूनी गतिविधियों की ओर आकर्षित हों। गरीबी में फंसे युवाओं की मजबूरी का फायदा देश विरोधी तत्व उठाते हैं और मामूली लालच देकर हमारे देश को खोखला करते हैं।
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अमृतसर के सीमांत गांवों में जाते बंजारे। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।
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विस्तार
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अमृतसर का अंतिम गांव दाओके पाक सरहद की कटीली तारों से महज 50 मीटर दूर है। इस गांव की आबादी करीब 2800 है। मोबाइल का सिग्नल यहां कम ही मिलता है। गांव की ओर जाने वाला रास्ता कच्चा है। आजादी के 75 वर्ष बाद भी यह गांव विकास की दौड़ में कोसों पीछे है। स्वास्थ्य, शिक्षा, बिजली, सड़क आदि बुनियादी सुविधाएं भी यहां नसीब नहीं। अमर उजाला की टीम ने गांव का दौरा किया।

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गांव में थोड़ा आगे जाने पर जरनैल सिंह और लखबीर सिंह मिल जाते हैं। सवालों के सिलसिले के बीच उनका दर्द सामने आता है। कहते हैं कि गांव में ज्यादा पढ़े लिखे लोग नहीं हैं। पूरा गांव खेतीबाड़ी के सहारे जिंदा है। आधी से ज्यादा जमीन तो कंटीली तारों के उस पार है। पाकिस्तान से जब भी हालात तनावपूर्ण होते हैं, खेती भी ठप हो जाती है। दोनों बताते हैं कि शिक्षा का हाल तो यह है कि ज्यादातर बच्चे 8वीं और 10वीं कक्षा के बाद पढ़ ही नहीं पाते। सीमांत इलाके में उच्च शिक्षा के लिए कोई कॉलेज नहीं और गरीबी के कारण 80 फीसदी से ज्यादा परिवार अपने बच्चों को पढ़ने के लिए शहर नहीं भेज पाते है। 

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इसी दौरान मिंटा और बलविंदर भी आ जाते हैं। मिंटा 8वीं पास हैं जबकि बलविंदर अशिक्षित हैं। दोनों हलवाई की दुकान में काम करते हैं। उन्होंने बताया कि नशा गांव की बड़ी समस्या है। गलत हाथों में पड़कर कितने ही युवा अपना जीवन बर्बाद कर लेते हैं। कुछ गैरकानूनी गतिविधियों में भी शामिल हो चुके हैं। 

इसके बाद चर्चा को आगे बढ़ाने के लिए हमने कुछ बुजुर्गों का रुख किया। सुरजीत सिंह(75), सुखविंदर सिंह छिंदा (62) और गरीबू (65) बताते हैं कि बेकारी और बेरोजगारी के कारण पंजाब के जवान गलत रास्ते पर जा रहे हैं। यदि युवाओं को रोजगार और शिक्षा के उचित मौके मिलें तो कोई वजह नहीं कि युवा गैरकानूनी गतिविधियों की ओर आकर्षित हों। गरीबी में फंसे युवाओं की मजबूरी का फायदा देश विरोधी तत्व उठाते हैं और मामूली लालच देकर हमारे देश को खोखला करते हैं। यह सरकारों की जिम्मेदारी है कि सीमांत इलाकों में बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराए। हमने तो खेतीबाड़ी करके अपना जीवन काट लिया लेकिन आज की पीढ़ी की अपनी ख्वाहिशें हैं। वह अच्छा जीवन जीना चाहती है। ऐसे में उन्हें उचित मौके मिलने चाहिए। जब सही रास्ता दिखाई नहीं देता तब युवा गलत रास्ते पर भटक जाते हैं। इन्हें रोकने का एक ही तरीका है, वह है रोजगार।

सीमांत गांव राजाताल के हाल

गांव राजाताल में आबादी करीब 3500 है। यहां हमारी मुलाकात हुई मनरियासत सिंह, मनबिलावर सिंह, गुरबचन सिंह और सुरिंदर सिंह से। उन्होंने बताया कि 8वीं या 10वीं के बाद शिक्षा छोड़ने वाले ग्रामीण युवा बेरोजगार हो जाते हैं और गांवों में ही जमींदारों के पास या गांव की दुकानों पर काम करने लगते हैं। यहीं से नशीले पदार्थों की तस्करी करने वाले और देश विरोधी गतिविधियों  को अंजाम देने वाले देश विरोधी तत्वों का खेल शुरू हो जाता है। तस्कर और देश विरोधी तत्व ऐसे युवाओं की पहचान कर उनसे संपर्क साधते हैं। उन्हें बहुत जल्द अमीर बनने के सब्जबाग दिखाकर हेरोइन तस्करी या फिर हथियारों को एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। पिछले दिनों सीमांत क्षेत्रों से हेरोइन और हथियारों के साथ पकड़े गए मामले इस बात की गवाही देते हैं। 

पहले शराब, अफीम अब हेरोइन स्मैक का नशा

राजाताल के बुजुर्ग पूर्ण सिंह, स्वर्ण सिंह, बलकार सिंह और प्रगट सिंह बताते हैं कि पहले लोग शराब और अफीम का नशा करते थे, जो इतना खतरनाक नहीं होता। आज हेरोइन और स्मैक का नशा करते हैं, जो खतरनाक होने के साथ-साथ महंगा भी है। इसकी पूर्ति के लिए बहुत से युवा चोरी और लूटमार करने लगते हैं। कुछ युवा तो नशा तस्करों और देश विरोधी तत्वों के हत्थे चढ़ जाते हैं, जो इन्हें एक कोरियर के रूप में इस्तेमाल करते हुए नशे या हथियार की खेप को ठिकाने लगवाते हैं। इनके परिवार वालों को भी इसका तभी पता चलता है जब सुरक्षा एजेंसियां इन्हें काबू कर लेती हैं। 

सीमांत गांवों के लोगों को खलती है कॉलेज की कमी

भारत-पाक सीमा के निकट स्थित गांवों के लोगों को सबसे अधिक कमी कॉलेज की खलती है। क्योंकि ग्रामीण बच्चे 10वीं तक तो सरकारी स्कूल में पढ़ लेते हैं। इसके बाद उनके पास कोई संसाधन नहीं होते। सिर्फ 10 से 15 फीसदी युवा ही इससे आगे की पढ़ाई जारी रख पाते हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें 40 से 45 किलोमीटर तक का सफर तय करके अमृतसर जाना पड़ता है। लोगों का कहना है कि सरकार को सीमांत इलाकों में कॉलेज और ट्रेनिंग सेंटर खोलने चाहिए। ताकि ग्रामीण युवा उच्च शिक्षा लेकर अपना रोजगार शुरू कर सकें। 
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सरकारों को समझनी चाहिए अपनी जिम्मेदारी : सरपंच

राजाताल गांव की महिला सरपंच अमृत पाल कौर कहती हैं कि इसमें सरकारों को अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए। सीमांत इलाकों में कॉलेज खोलने के साथ-साथ छोटे-छोटे कारखाने लगाने चाहिए। क्योंकि बॉर्डर पर कब जंग छिड़ जाए, कुछ पता नहीं। यह देखते हुए कारोबारी या उद्योगपति तो यहां काम कभी भी शुरू करेगा, तो सरकार को इन गांवों के पढ़े-लिखे युवाओं को गांवों के ही शैक्षणिक संस्थानों में एडहॉक पर नियुक्त करना चाहिए। वहीं कम पढ़े लिखे युवाओं को ट्रेनिंग देकर इस काबिल बनाया जाए कि या तो वह कहीं नौकरी कर सकें या फिर अपना कारोबार शुरू कर सकें।

सीमांत गांवों के लोगों को नहीं मिल पातीं सरकारी सुविधाएं

दाओके गांव के सरपंच हरप्रीत सिंह कहते हैं कि सीमांत गांवों के लोग कम पढ़े-लिखे होते हैं और उन्हें अपने अधिकारों का भी पता नहीं होता। कम जानकारी होने के कारण लोग सरकार द्वारा मिलने वाली सुविधाएं भी हासिल नहीं कर पाते। सरकारी दफ्तरों से उन्हें परेशान किया जाता है, कि वे चुपचाप अपने घरों में बैठ जाते हैं। उन्होंने कहा कि सरकार को बॉर्डर बेल्ट तीन हिस्सों में बांट देनी चाहिए। जीरो से 5 किलोमीटर तक ए कैटेगरी, 5 से 20 किलोमीटर तक बी कैटेगरी और 20 से 30 किलोमीटर तक सी कैटेगरी। इनके मुताबिक ही लोगों को सरकारी स्कीमों का फायदा दिया जाना चाहिए। युवाओं को गलत रास्ते पर जाने से रोकने के लिए सरकार को अलग से नीति बनानी चाहिए, ताकि गांवों के कम पढ़-लिखे युवाओं को भी अपना भविष्य सुरक्षित लगे।
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