फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

अच्छी खबरः पंजाब के किसानों ने दिखाई सूझबूझ, 60 फीसदी ने पराली जलाने से किया तौबा

Sun, 20 Oct 2019 12:50 PM IST
ajay kumar न्यूज डेस्क, अमर उजाला, चंडीगढ़
विज्ञापन
प्रतीकात्मक तस्वीर
विज्ञापन

पंजाब में किसानों द्वारा धान की पराली जलाने के मामलों में लगातार कमी आ रही है। वर्ष 2016 में 1 अक्तूबर से 10 अक्तूबर तक जहां पराली को आग लगाने के 3715 मामले सामने आए थे, वह इस साल इसी अवधि में केवल 700 रह गए हैं।

विज्ञापन


यह दावा पंजाब के कृषि सचिव काहन सिंह पन्नू ने किया है। ओवरआल पंजाब के 60 फीसदी किसानों ने अब पराली जलाना छोड़ दिया है और हैपी सीडर जैसी नवीन तकनीक के जरिए खेतों में पराली का निष्पादन किया जा रहा है।

डिजिटल मीडिया पर एक साक्षात्कार के दौरान पन्नू ने बताया कि उन्होंने एनजीटी के समक्ष यह आंकड़े पेश किए हैं, जिसके अनुसार राज्य के 22 में से 14 जिलों में पराली जलाने के मामलों में 50 फीसदी तक कमी आ चुकी है। उन्होंने बताया कि केवल आठ जिलों में सरकार को जागरुकता अभियान और तेज करना पड़ रहा है। 
विज्ञापन


पन्नू ने कहा कि किसानों में पराली न जलाने को लेकर जागरुकता बढ़ी है और उन्होंने मशीनों का उपयोग शुरु कर दिया है। उन्होंने बताया कि यह किसानों में आई जागरूकता का ही असर है कि इस बार 3100 गांव में पराली जलाने का एक भी मामला सामने नहीं आया है।

धान के सीजन में बिगड़ती है पंजाब की हवा

उन्होंने बताया कि पराली जलाने का मुद्दा एक गंभीर चुनौती बन गया है। पंजाब में 1980 से पहले धान के अधीन केवल 3 लाख हेक्टेयर भूमि थी, जो अब 30 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है। इस तरह धान का उत्पादन बढ़ने के साथ ही उससे निकलने वाली पराली की मात्रा भी बढ़ी है। उन्होंने बताया कि इतनी बड़ी मात्रा में पराली को आग लगाने से प्रदेश की हवा हर साल दूषित हो रही है। 

उन्होंने बताया कि सामान्य दिनों में पंजाब का एयर क्वालिटी इंडेक्स 70-100 के बीच रहता है और धान के सीजन में यह बढ़कर 200 तक पहुंचता है। लेकिन दिवाली के आसपास यह बढ़कर 400 के अत्यंत खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है।

पराली न जलाने से बढ़ी गेहूं की पैदावार
पन्नू ने बताया कि किसानों द्वारा पराली जलाने के पारंपरिक तरीके को छोड़ने के बाद यह बात भी सामने आई है कि इन्हीं खेतों में एक तरफ तो यूरिया-डीएपी आदि की उपयोग घटा है, वहीं अगली फसल गेहूं की पैदावार में भी लगातार बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने बताया कि बीते दो सालों से पंजाब में गेहूं की पैदावार 131 लाख टन तक पहुंच चुकी है, जिसे देखते हुए यह अनुमान है कि पराली को जलाने का काम पूरी तरह खत्म करने पर यह उत्पादन 140 लाख टन तक पहुंच जाएगा। 
विज्ञापन

उन्होंने बताया कि 2017 के मुकाबले 2019 में पंजाब के खेतों में यूरिया की खपत में 2 लाख टन और डीएपी की खपत में 80 हजार टन की कमी आई है, क्योंकि धान की पराली को खेत में ही खपाए जाने से खेतों की उपजाऊ क्षमता में इजाफा हुआ है। इससे किसानों को सीधे तौर पर 300 करोड़ रुपये की बचत हुई है।

इस साल 24000 हैपी सीडर की मांग
पन्नू ने बताया कि पराली के निष्पादन के लिए किसानों की ओर से कृषि विभाग को 24000 हैपी सीडर मशीनों के लिए आवेदन मिले हैं, जिनमें से 15000 मशीनें दे दी गई हैं और बाकी भी जल्दी ही मुहैया करा दी जाएंगी। उन्होंने बताया कि यह मशीनें सब्सिडी पर मुहैया कराई जा रही हैं। किसानों के समूहों को यह मशीनें 80 फीसदी और निजी किसानों को 50 फीसदी सब्सिडी पर मशीनें दी जा रही हैं।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें