उन्होंने बताया कि पराली जलाने का मुद्दा एक गंभीर चुनौती बन गया है। पंजाब में 1980 से पहले धान के अधीन केवल 3 लाख हेक्टेयर भूमि थी, जो अब 30 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गई है। इस तरह धान का उत्पादन बढ़ने के साथ ही उससे निकलने वाली पराली की मात्रा भी बढ़ी है। उन्होंने बताया कि इतनी बड़ी मात्रा में पराली को आग लगाने से प्रदेश की हवा हर साल दूषित हो रही है।
उन्होंने बताया कि सामान्य दिनों में पंजाब का एयर क्वालिटी इंडेक्स 70-100 के बीच रहता है और धान के सीजन में यह बढ़कर 200 तक पहुंचता है। लेकिन दिवाली के आसपास यह बढ़कर 400 के अत्यंत खतरनाक स्तर तक पहुंच जाता है।
पराली न जलाने से बढ़ी गेहूं की पैदावार
पन्नू ने बताया कि किसानों द्वारा पराली जलाने के पारंपरिक तरीके को छोड़ने के बाद यह बात भी सामने आई है कि इन्हीं खेतों में एक तरफ तो यूरिया-डीएपी आदि की उपयोग घटा है, वहीं अगली फसल गेहूं की पैदावार में भी लगातार बढ़ोतरी हुई है। उन्होंने बताया कि बीते दो सालों से पंजाब में गेहूं की पैदावार 131 लाख टन तक पहुंच चुकी है, जिसे देखते हुए यह अनुमान है कि पराली को जलाने का काम पूरी तरह खत्म करने पर यह उत्पादन 140 लाख टन तक पहुंच जाएगा।
उन्होंने बताया कि 2017 के मुकाबले 2019 में पंजाब के खेतों में यूरिया की खपत में 2 लाख टन और डीएपी की खपत में 80 हजार टन की कमी आई है, क्योंकि धान की पराली को खेत में ही खपाए जाने से खेतों की उपजाऊ क्षमता में इजाफा हुआ है। इससे किसानों को सीधे तौर पर 300 करोड़ रुपये की बचत हुई है।
इस साल 24000 हैपी सीडर की मांग
पन्नू ने बताया कि पराली के निष्पादन के लिए किसानों की ओर से कृषि विभाग को 24000 हैपी सीडर मशीनों के लिए आवेदन मिले हैं, जिनमें से 15000 मशीनें दे दी गई हैं और बाकी भी जल्दी ही मुहैया करा दी जाएंगी। उन्होंने बताया कि यह मशीनें सब्सिडी पर मुहैया कराई जा रही हैं। किसानों के समूहों को यह मशीनें 80 फीसदी और निजी किसानों को 50 फीसदी सब्सिडी पर मशीनें दी जा रही हैं।