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कोविड-19: इन पांच कारणों से कोरोना वायरस बन गया है घातक

Sat, 24 Oct 2020 09:01 AM IST
अमर शर्मा बीबीसी हिंदी
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
कोरोना वायरस ने पूरी दुनिया में लोगों को बुरी तरह प्रभावित किया है। पहले भी इंसान के सामने वायरस का खतरा था। पहले भी महामारियां फैली थीं लेकिन दुनिया को हर नए संक्रमण या फ्लू से निपटने के लिए इस तरह रुकना नहीं पड़ा था।

तो इस कोरोना वायरस में ऐसा क्या है? इसकी बायोलॉजी में ऐसी क्या बात है जो हमारे शरीर और जीवन के लिए खतरनाक बन जाती है।

धोखा देने में माहिर
संक्रमण के शुरुआती चरणों में कोरोना वायरस आपके शरीर को धोखा देने में कामयाब हो जाता है।

कोरोना वायरस हमारे फेफड़े और श्वसन तंत्र में बड़े पैमाने पर मौजूद होता है लेकिन हमारे प्रतिरक्षा तंत्र (इम्यून सिस्टम) को लगता है कि सबकुछ ठीक है।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज में प्रोफेसर पॉल लेहनर कहते हैं, "ये गजब का वायरस है। ये आपकी नाक में वायरस की फैक्ट्री बना लेता है और आपको लगता रहता है कि आप ठीक हैं।"

हमारे शरीर की कोशिकाएं इंटरफर्नो नाम के केमिकल्स रिलीज करती हैं। जब इन केमिकल्स पर कोई वायरस कब्जा करता है तब हमारे शरीर और प्रतिरक्षा तंत्र को वायरस की मौजूदगी की चेतावनी मिलने लगती है।

लेकिन, कोरोना वायरस में इस चेतावनी को रोकने की ‘गजब की क्षमता’ होती है। प्रोफेसर लेहनर कहते हैं, “ये काम वायरस इतनी अच्छी तरह करता है कि आपको पता ही नहीं चलता कि आप बीमार हैं।”

वह बताते हैं कि जब आप संक्रमित कोशिकाओं को लैब में देखते हैं तो वो बिल्कुल भी संक्रमित नहीं लगतीं लेकिन जब आप टेस्ट करते हैं तो पता चलता है कि इनमें बहुत सारा वायरस मौजूद है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : iStock
हिट एंड रन जैसा वायरस
जब हमारे शरीर में मौजूद वायरस 'लोड पीक' पर पहुँच जाता है तब हम बीमार पड़ते हैं और लक्षण दिखने लगते हैं।

ऐसे में लक्षण ना दिखने के बावजूद भी वायरस शरीर में मौजूद होता है और एक से दूसरे व्यक्ति में फैल सकता है।

मरीज के अस्पताल में भर्ती होने की स्थिति तक पहुँचाने में वायरल लोड को करीब एक हफ्ते का समय लगता है।

प्रोफेसर लेहनर कहते हैं, “यह खुद के विकास का एक शानदार तरीका है। यह मरीज को तुरंत अस्पताल नहीं पहुँचाता बल्कि ठीक महसूस कराता है, आराम से बाहर घूमने देता है ताकि वायरस और फैल सके।”

इसलिए कोरोना वायरस उस ड्राइवर की तरह है जो दुर्घटना करके तुरंत भाग जाता है। वायरस भी किसी संक्रमित व्यक्ति के ठीक होने या मरने से पहले तुरंत ही दूसरे व्यक्ति में भी चला जाता है।

साल 2002 के मूल सार्स-कोरोना वायरस और मौजूदा कोरोना वायरस में ये बहुत बड़ा अंतर है।

मूल सार्स-कोरोना वायरस में लोगों के बीमार होने यानी लक्षण दिखने के बाद संक्रमण का खतरा सबसे ज्यादा होता था जिससे उन्हें आईसोलेट करना आसान हो जाता था। 
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कोरोना वायरस (फाइल फोटो) - फोटो : PTI
शरीर के लिए अजनबी वायरस
पिछली महामारी को याद करें? साल 2009 में एच1एन1 यानी स्वाइन फ्लू को लेकर लोगों में बहुत डर था।

हालांकि, यह उतना जानलेवा नहीं निकला जितनी चिंता जताई जा रही थी।

इसकी वजह थी कि बुजुर्गों में इस वायरस से लड़ने की क्षमता कुछ हद तक पहले से ही मौजूद थी। क्योंकि इसी तरह का वायरस पहले भी फैल चुका था। ऐसे चार और इंसानी कोरोना वायरस होते हैं जिनमें जुकाम जैसे लक्षण सामने आते हैं।

यूनिवर्सिटी ऑफ मैनचेस्टर से प्रोफेसर ट्रेसी हसल कहती हैं, “ये नए तरह का वायरस है इसलिए लोगों में इससे लड़ने के लिए पहले से इम्यूनिटी नहीं है। इसके नए प्रभाव आपके इम्यून सिस्टम के लिए एक झटका साबित होते हैं।”

इसकी तुलना यूरोप में हुए स्मॉलपॉक्स से की जा सकती है। उसके लिए भी लोगों में पहले से प्रतिरक्षा मौजूद नहीं थी जिसके बहुत घातक परिणाम निकले।

किसी वायरस से लड़ने के लिए एकदम नई इम्यूनिटी बना पाना बुजुर्गों के लिए बहुत बड़ी समस्या है क्योंकि उनका प्रतिरक्षा तंत्र कमजोर हो चुका होता है।

एक नए वायरस से लड़ने के लिए प्रतिरक्षा तंत्र को बहुत से बदलावों से गुजरना पड़ता है।

जैसे कि हम किसी नई समस्या को सुलझाने के लिए कई तरीके अपनाते हैं। इनमें से कुछ तरीके सफल होते हैं, कुछ असफल होते हैं और कुछ में बदलाव भी करना पड़ता है।

इसी तरह प्रतिरक्षा तंत्र भी काम करता है। लेकिन, अधिक उम्र में प्रतरिक्षा तंत्र का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाने वाले टी-सेल्स बहुत कम बनते हैं। इसलिए नई प्रतिरक्षा बन पाना मुश्किल होता है। 

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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
पूरे शरीर तक पहुंच
कोरोना वायरस फेफड़ों को प्रभावित करते हुए पूरे शरीर में फैल जाता है।

किंग्स कॉलेज लंदन में प्रोफेसर मारो गाका कहते हैं कि कोविड के कई पहलू बहुत अनोखे हैं। “यह दूसरी वायरल बीमारियों से अलग है।” वह कहते हैं कि यह ना सिर्फ फेफेड़ों में मौजूद कोशिकाओं को मारता है बल्कि उन्हें खराब भी कर देता है। इससे खराब हो चुकी कोशिकाएं अपने आसपास की स्वस्थ कोशिकाओं से जुड़ती हैं और उन्हें भी बीमार करके एक बड़ा रूप धारण कर लेती हैं।

प्रोफेसर गाका कहते हैं कि फ्लू के बाद आपके फेफड़े फिर से पूरी तरह स्वस्थ हो सकते हैं लेकिन कोविड में ऐसा नहीं होता। यह एक अजीब तरह का संक्रमण है।

इसमें शरीर में खून के थक्के भी जमने लगते हैं। कई बार डॉक्टर्स को थक्के जमने के कारण मरीजों में नसें ढूंढने में भी मुश्किल आती है।

किंग्स कॉलेज लंदन में प्रोफेसर बेवरली हंट कहती हैं कि कोविड के कुछ मरीजों में खून में थक्का जमाने वाले केमिकल्स सामान्य से “200, 300, 400 गुना ज्यादा” तक पाए गए हैं।

उन्होंने इनसाइड हेल्थ से कहा था, “मैं ईमानदारी के साथ कहना चाहती हूं कि अपने करियर में मैंने इतने गाढ़े खून वाले मरीज पहले नहीं देखे थे।”

कोरोना वायरस के पूरे शरीर पर प्रभाव डालने के पीछे वजह है, शरीर में मौजूद एसीई2 रिस्पेटर जिसके जरिए वायरस कोशिकाओं को संक्रमित करता है।

एसीई2 रिस्पेटर एक तरह का प्रोटीन है जो रक्त कोशिकाओं, फेफड़ों, लिवर, और किडनी सहित पूरे शरीर में पाया जाता है। इसलिए कोरोना वायरस हर अंग तक पहुँच बना लेता है। 
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प्रतीकात्मक तस्वीर - फोटो : Pixabay
वसा है खतरनाक
अगर आपका वजन अधिक है तो कोविड-19 आपको ज्यादा नुकसान पहुँचा सकता है।

यूनिवर्सिटी ऑफ कैम्ब्रिज में प्रोफेसर स्टीफन ओ रेहली कहते हैं, “इसका मोटापे से गहरा संबंध है जोकि हमने दूसरे वायरस संक्रमणों में नहीं देखा है। फेफड़ों में होने वाली दूसरी समस्याओं में मोटे लोगों के ज्यादा बेहतर परिणाम आते हैं।”

दरअसल, पूरे शरीर में मौजूद वसा से मेटाबॉलिक गड़बड़ियां होती हैं जो कोरोना वायरस से जुड़कर और बुरा असर डालती हैं।

कोरोना वायरस और इसके प्रभाव से जुड़ी कई और अनजानी बातें समय के साथ सामने आ सकती हैं। जैसे-जैसे इसकी तहें खुलती जाएंगी वैसे-वैसे मानव शरीर भी इससे निपटने के लिए खुद को तैयार कर सकेगा।
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