कहानी है, किवदंती है या महज लोक कथा..., पर बनारस में आशिक माशूक की कब्र मुहब्बत की इबारत लिख रही है। वही प्रेम कहानी, जो जीते जी पूरी न हुई न सही, मरकर अमर हो गई। आज भी उनकी कब्र पर प्रेमी जोड़े पहुंचते हैं। मन्नतों और मुरादों का यहां मेला लगता है। ये जगह प्यार करने वालों के लिए किसी धार्मिक स्थल से कम नहीं है। यूं तो गाहे-बगाहे आशिक-माशूक की मज़ार पर छुप-छुपाकर या खुले में प्यार के परिंदे उड़ते हुए आ जाते हैं। लेकिन वेलेंटाइन डे पर यहां आने वालों की संख्या कुछ बढ़ जाती है। आगे की स्लाइड्स में देखें तस्वीरें..
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- फोटो : अमर उजाला
वो इक आशिक था जो माशूका की तलाश में गंगा की लहरों में कूद गया। ये जानते हुए कि उसे तैरना नहीं आता, और दूसरी तरफ थी उसकी मुहब्बत, उसकी मरयम। अपने आशिक की खातिर उसने भी गंगा की गोद में सोना कुबूल कर लिया। ये महज आशिक-माशूक की कहानी नहीं, काशी की रवायत है। आज भी उनकी कब्र पर प्रेमी पहुंचते हैं। मन्नतों और मुरादों का यहां मेला लगता है। खास ये कि जिनकी मुहब्बत परवान चढ़ती है, उनके रिश्ते को नाम मिलता है, वो यहां मन्नत उतारना नहीं भूलते। यहां चादर चढ़ने के साथ शादी के कार्ड तक चढ़ते हैं।
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- फोटो : अमर उजाला
हजरत आशिक-माशूक की ये मजार वाराणसी स्थित सिगरा सिद्धगिरीबाग पर है जहां हर प्रेमी जोड़े अपनी मन्नतें मुरादें लेकर आते हैं। गुरुवार को यहां खासी भीड़ उमड़ती है। मुतवल्ली मोहम्मद फरीद शाह की मानें तो आज से करीब 400 साल पहले ईरान के यूसुफ और बनारस की मरयम की मुहब्बत परवान चढ़ी। ईरान के मोहम्मद समद अपने बेटे यूसुफ को लेकर बनारस आए थे।
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- फोटो : अमर उजाला
अलईपुरा में मेले के दौरान यूसुफ और मरयम मिले थे। ये पहली नजर का ही प्यार था। दोनों की मुहब्बत बढ़ती गई और लोगों के बीच इसकी चर्चा भी। एक दिन मरयम के अब्बा को ये बात पता चल गई। लोक लाज के डर से उसके वालिद ने मरयम को रामनगर अपने एक रिश्तेदार के पास भेज दिया। बताते हैं कि जब यूसुफ को इसका पता चला तो वो प्रेम में बांवरा हो गया। वह मरयम की तलाश में गंगा किनारे जा पहुंचा। वहां उसे मरयम की चप्पल मिली।
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- फोटो : अमर उजाला
मरयम की तलाश में यूसुफ गंगा में कूद गया, जबकि उसे तैरना नहीं आता था। अपने इश्क में वो ऐसा डूबा कि फिर निकल नहीं पाया। मरयम को जब इसकी खबर लगी तो उसने भी गंगा में छलांग लगा दी। लोग बताते हैं कि कई दिनों बाद गंगा में से इनकी लाश निकाली गई तो दोनों के हाथ एक दूसरे से जकड़े हुए थे।
बाद में उन्हें यहीं सिगरा पर सुपुर्देखाक किया गया और उनकी मजार बना दी गई। जैसे जैसे उनकी मुहब्बत के अफसाने चर्चा में आए, उनके आस्ताने पर लोगों की भीड़ जुटने लगी। आज भी इस समाधि पर लोग अपने शादी का कार्ड देते हैं। इस उम्मीद के साथ कि मरयम और यूसुफ जैसी मुहब्बत उनके बीच हमेशा बनी रहे।