सांस्कृतिक नगरी काशी के बारे में कहावत है-‘सात वार नौ त्योहार’। यानी इस शहर में हफ्ते में सात दिन होते हैं और नौ त्योहार। मंगलवार को यहां वरुणा नदी के तट पर बेहद अनूठा मेला लगा। मेले में दारू से देवी को अर्घ्य दिया गया। मेले में गंगा जमुनी तहजीब की मिसाल के भी देखते बनी। आगे की स्लाइड्स में देखें तस्वीरें...
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- फोटो : अमर उजाला
अनूठी परंपराएं, घाट से गलियों तक विविधताओं से भरे सांस्कृतिक जीवन की दुनिया दीवानी है। इस प्राचीन नगरी के गंगा जल से हर सनातनधर्मी पवित्र होता है लेकिन मंगलवार को दारू से देवी को अर्घ्य दिया गया। वर्ष भर मंगल रहे, बच्चों, बड़ों को बीमारियां, कष्ट न घेरने पाएं, इस कामना से कलिका सहजा माता की याद में प्याले भरे जाते हैं।
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मंगलवार को वाराणसी के वरुणा नदी के तट पर चौकाघाट पर दारू से हजारों लोगों ने अपनी कुल देवी को अर्घ्य दिया। खुलेआम जाम से भरे प्याले आस्थावानों ने छलकाए। डफालियों ने डफ बजाया और कालिका सहजा देवी की याद में हजारों लोग झूम उठे। मौका था वरुणा पियाला मेला का।
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तट के किनारे वेदियों पर दारू से भरे प्याले सजाए गए। शराब से प्याले भरने के बाद मां कालिका सहजा देवी की पूजा शुरू हुई। शंख की जगह डफालियों ने डफ बजाएंगे। इस मेले में सहजा माता की पूजा के लिए डफ बजाने वाले डफाली मुसलमान होते हैं और पूजा करने वाले हिंदू। जिला धोबी घाट बचाओ संघर्ष समिति के अध्यक्ष नंदू कन्नौजिया के अनुसार कालिका सहजा माता उनके समाज की कुलदेवी हैं।
कालिका सहजा देवी की याद में वरुणा नदी के तट पर अपने तरह का अनूठा सांस्कृतिक मेला मंगलवार को यादगार बन गया। पियाला मेला में छोटी बिरादरी के लोगों का समागम हुआ। चौकाघाट पर करीब एक किमी के दायरे में धोबी, बिंद के अलावा इनसे जुड़ी अन्य बिरादरी के लोग पौ फटने से पहले ही वरुणा नदी के तट पर दारू लेकर पहुंचने लगे।