एक भरोसो, एक बल, एक आस विश्वास... इसे विश्वास और भरोसा की पराकाष्ठा की कहेंगे, जब जेठ की भीषण गर्मी और उमस के बीच लाखों श्रद्धालुओं की कारवां उमरहा गांव की क्यारियों में बनी यज्ञशाला के कुंडों में अग्नि प्रज्ज्वलित कर आहुति देने के लिए उमड़ पड़ा।
ऐसा लग रहा था मानों साक्षात वैदिक काल की संस्कृति धरा पर एक बार फिर उतर आई हो। हर तरफ वेद ऋचाओं के सस्वर गान, मंत्रोच्चार और आहुतियां। देखते-देखते वाराणसी-गाजीपुर मार्ग से लगे इलाकों के आसमान पर यज्ञ कुंड में दी जा रही सामूहिक आहुतियों के धुएं बादलों की तरह मंडराने लगे और चारों तरफ छा गए।
घर, परिवार से लेकर, समाज और राष्ट्र तक के मंगल की कामनाओं से भरे 1.50 लाख से अधिक श्रद्धालुओं ने 21000 कुंडों में तन, मन , पर्यावरण की शुद्धता के लिए आहुति दी। स्वर्वेद ज्ञान यज्ञ में विकारों, कष्टों, क्लेश और वैमनस्यों की आहुति देने के लिए भोर चार बजे से ही पंजीकृत श्रद्धालु परिवारीजनों, रिश्तेदारों के साथ कुंडों पर आसन जमाने लगे।
संत स्वतंत्रदेव महाराज, विज्ञानदेव महाराज ने सुबह करीब छह बजे ऊं अंकित श्वेत ध्वजा का आरोहण किया। इसी के साथ 20 लाख वर्ग फुट एरिया में बने यज्ञ मंडप में पर्णकुटी के आकार में तैयार किए गए मंच पर दक्षिण भारतीय आचार्यों, वेद बटुकों ने स्वर मंत्रोच्चार आरंभ किया।
तबतक उमरहा गांव से लेकर डुबकिया तक से सीवान में सिर्फ हवन वेदियों पर श्रद्धालुओं की भीड़ किसी महा अनुष्ठान रूपी मेले में तब्दील हो चुकी थी। यज्ञशाला में मंच के सामने आचार्य परिवार के सदस्यों ने आहुति दी। इसमें माता सुशीला देवी भी शामिल थीं। पीएम नरेंद्र मोदी के छोटे भाई पंकज मोदी भी यज्ञ स्थल पर पहुंचे। यूपी, बिहार, झारखंड के कई संतों ने भी हाजिरी लगाई।
विश्व शांति वैदिक महायज्ञ में देश के कई राज्यों के अलावा फ्रांस, अमेरिका, जर्मनी, मॉरीशस, दुबई नेपाल, आस्ट्रेलिया, साऊथ अफ्रीका से भी श्रद्धालु आहुति देने के लिए पहुंचे। मानव मन की शांति और आध्यात्मिक उत्थान के लिए ब्रह्मविद्या विहंगम योग के क्रियात्मक ज्ञान की दीक्षा भी दिलाई गई।