बेटे से मां के नेह की कोई मिसाल नहीं हो सकती। लाख जतन से परवरिश और फिर उसकी कामयाबी-तरक्की से खुशहाली तक की अनगिनत दुआएं। किसी भी मां-बाप की ख्वाहिश यही होती है कि बेटा पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ा हो और बुढ़ापे में उनका सहारा बने। वाराणसी के सारनाथ स्थित आनंद नगर कॉलोनी निवासी सुमन गुप्ता के ख्वाब भी यही थे लेकिन अरमानों की दुनिया में अंधेरा पसरा गया। आगे की स्लाइड्स में जानिए
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- फोटो : अमर उजाला
जिस बेटे के लिए न जाने कितने सपने देखे, उसी ने आंखें छीन लीं। बेटे की करतूत से आसपास के लोग सन्न हैं। घर से अस्पताल और थाने तक जिस किसी को भी घटना की जानकारी हुई वह स्तब्ध रह गया। दरअसल, दो साल पहले तक स्थितियां ऐसी नहीं थी। स्नातक की पढ़ाई के बाद चंदन रोजगार की तलाश में था लेकिन दो साल पहले पत्नी सरोज से तलाक के बाद वह डिप्रेशन में आ गया। उसके बाद बेरोजगारी के बढ़ते दबाव ने उसे मानसिक रूप से और विकृत कर दिया।
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- फोटो : अमर उजाला
चंदन के छोटे भाई सीमांत के साथ बीएचयू ट्रॉमा सेंटर में मौजूद पड़ोसी विक्की ने बताया कि वह खुद के खर्च के लिए रुपये मांगने के दौरान अकसर मां से उलझ जाया करता था। आए दिन उसका किसी न किसी से झगड़ा होता ही रहता था। वहीं, सारनाथ थाने की हवालात में चंदन ने पुलिस को बताया कि मानसिक रोग की चपेट में आने पर उसका उपचार चल रहा था लेकिन तलाक के बाद से घरवालों का उसके प्रति नजरिया ही बदल गया। मां-बाप तलाक के लिए उसे जिम्मेदार ठहराते थे जबकि पत्नी ने मां-बाप के चलते ही तलाक लिया।
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- फोटो : अमर उजाला
पुलिस और छोटे बेटे सीमांत से घटना की जानकारी पाकर श्याम नारायण गुप्ता के जल्द यहां पहुंचने की उम्मीद है। ट्रॉमा सेंटर में भर्ती सुमन गुप्ता की हालत बेहद नाजुक बनी हुई है। उनकी दोनों आंखों की रोशनी जाने के बाद चिकित्सकों की टीम उनकी जिंदगी बचाने में जुटी है। एसपी सिटी दिनेश कुमार सिंह ने बताया कि आरोपी चंदन ने साल भर पहले भी अपनी मां पर चाकू से हमला किया था। उसकी आपराधिक प्रवृत्ति को देखते हुए उसके खिलाफ पुख्ता साक्ष्याें के आधार पर कार्रवाई की जा रही है। (फोटो उसी घर की है जहां हमला हुआ)
मनोवैज्ञनिकों का कहना है कि पूरी तरह से यह मामला आपराधिक मनोवृत्ति का है। युवावस्था में अगर सही मार्गदर्शन न मिले तो भटकाव की गुंजाइश बढ़ जाती है। खास बात यह है कि ऐसे समय में वह अपनी सभी इच्छाओं की पूर्ति भी चाहता है और इसमें अवरोध उत्पन्न करने वाला ही उसका सबसे बड़ा दुश्मन होता है। इसमें आक्रामकता का स्तर इतना बढ़ जाता है कि घटना को अंजाम देने के समय वह यह भूल जाता है कि कौन अपना है और कौन पराया...। सारनाथ क्षेत्र की घटना में भी कुछ ऐसा ही हुआ है।