प्रवासी भारतीय सम्मेलन में जहां एक ओर बनारस की संस्कृति की झलक मिली। वहीं, दूसरी तरफ काशी का एक अलग ही रंग दिखा। काशीवासियों ने मेहमानों का स्वागत कुछ इस अंदाज में हुआ कि वो अपनी हंसी नहीं रोक सके। अगली स्लाइड्स में देखें...
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- फोटो : amar ujala
वाराणसी के सारनाथ से लेकर गंगा घाटों तक अलग-अलग वेशभूषा और रंग-रूप में लोग प्रवासी मेहमानों का स्वागत कर रहे थे। कोई गब्बर तो कोई यमराज का रुप धारण कर के मेहमानों को हंसाया।
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सबसे मजेदार बात तो यह थी कि ऐढ़े गांव की टेंट सिटी में एक जूता ऐसा था कि लोग उसे पहन नहीं रहे थे। बल्कि उसे यहां से वहां खिसका रहे थे। कई ने तो उसे इबनेबतूता का जूता तक कह दिए।
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अलग-अलग राज्यों से आए लोक कलाकारों के अस्सी से राजघाट तक छाऊ, ललिता घाट पर कालबेलिया नृत्य, करमा, बहरुपिया लोकनृत्यों के जरिए हिंदुस्तान भर की संस्कृति की झलक प्रवासी भारतीयों ने देखी।
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सनातनी परंपरा, शांति एवं सद्भाव का संदेश देने के लिए प्राचीन चेतसिंह घाट पर राम दरबार की झांकी सजी है तो रावण का भी दरबार सजा है। क्षीरसागर में भगवान विष्णु और लक्ष्मी की झांकी से लुभाया। पंचगंगा घाट पर कलाकारों ने पूर्वांचल के लोकगीत प्रस्तुत किए।
भगवान श्रीराम के अयोध्या लौटने पर यह दीपोत्सव के रूप में मनाया जाता है। टेंट सिटी में प्रवासियों का स्वागत शहनाई की धुनों से किया गया। वहीं, फूलों, पताकाओं, रंगोली से सजाई गई काशी प्रवासियों को बेहद न्यारी लगी।