Shiv Parvti Vivah Celebration: बाबा विश्वनाथ को सोमवार को हल्दी लगाई गई। इस दौरान डमरू, ढोल पर ऐसा जयघोष हुआ कि गोदौलिया से बांसफाटक तक लाइन में लगे भक्त भी झूम उठे।
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बाबा विश्वनाथ की हल्दी की रस्म निभाई गई
- फोटो : अमर उजाला
महाशिवरात्रि से दो दिन पहले सोमवार की शाम नागा साधुओं-संन्यासियों ने बाबा विश्वनाथ की हल्दी की रस्म निभाई। खास बनारसी ठंडई, पान और पंचमेवा का भोग लगाकर उन्हें राजसी स्वरूप में सजाया गया। इसके बाद पूरी रात टेढ़ीनीम स्थित पूर्व महंत आवास शिव भक्तों से भरा रहा।
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टेढ़ीनीम स्थित चौथे फ्लोर पर 15X8 साइज के कमरे में डमरू दल की गर्जना संग महात्मा, साधु, नागा, महिलाओं और श्रद्धालुओं ने एक साथ मंगल गीत गाकर बाबा विश्वनाथ को हल्दी लगाई।
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पहिरे ला मुंडन क माला मगर दुलहा लजाला..., शिव दुल्हा के माथे पर सोहे चनरमा... दुल्हा के देहीं से भस्मी छोड़ावा सखी हरदी लगावा ना... पर हर कोई अड़भंगी शिव बनकर झूम रहा था।
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श्रीपंचायती निरंजनी अखाड़ा के नागा साधु और महात्मा मणिकर्णिका घाट से मेवाड़ की हल्दी की शोभायात्रा लेकर निकले और सूर्यास्त के बाद टेढ़ीनीम स्थित पूर्व महंत आवास पर पहुंचे। एक थाल में हल्दी, 11 थाल में फल, 5 में मेवा-मिठाई, एक में वस्त्र और एक काल में आभूषण लेकर महंत आवास के अंदर प्रवेश किए।
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डमरुओं की निनाद, ढोल की गर्जना और हर-हर महादेव का जयघोष ऐसा हुआ कि गोदौलिया बाजार से लेकर बांसफाटक पर लाइनों में लगे विश्वनाथ भक्त भी झूम उठे। महंत परिवार के सदस्यों ने साधु-महात्माओं को अंगवस्त्रम और रुद्राक्ष की माला भेंट कर उनका जोरदार स्वागत किया।
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शुखहाल भारती ने लगाई पहली हल्दी
संत दिगंबर शुखहाल भारती ने बाबा विश्वनाथ को हल्दी लगाई। इसके बाद महिलाओं ने हल्दी की रस्म पूरी की। पूरा कमरा मंगल गीतों से गूंजता रहा और श्रद्धालु एक-एक बाबा विश्वनाथ को हल्दी लगाते रहे। के बीच शिव-पार्वती के मंगल दांपत्य के की कामना के गीत भी गाए गए।
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शिव की रजत मूर्ति को चावल से चूमा
हल्दी की रस्म के बाद नजर उतारने के लिए साठी क चाऊर चूमिय चूमिय... गीत गाकर महिलाओं ने भगवान शिव की रजत मूर्ति को चावल से चूमा। बाबा के तेल-हल्दी की रस्म दिवंगत महंत डॉ. कुलपति तिवारी की पत्नी मोहिनी देवी के सानिध्य में हुई। पूजन अर्चन का विधान उनके पुत्र पं. वाचस्पति तिवारी ने पूरा किया। बाबा को खास बनारसी ठंडई, पान और पंचमेवा का भोग लगाया गया। इससे पूर्व बाबा का विशेष राजसी-स्वरूप में शृंगार संजीव रत्न मिश्र ने किया।