काशी के तुलसीघाट पर सैकड़ों साल पुरानी परंपरा ‘नाग नथैया’ लीला रविवार को फिर जीवंत हो उठी। शिव की नगरी काशी में गंगा जहां यमुना बनी वहीं कान्हा ने प्रदूषणरूपी कालिया नाग का मर्दन कर गंगा को प्रदूषणमुक्त करने का संदेश दिया। कान्हा के कदम के पेड़ से छलांग लगाते ही हर तरफ वृंदावन बिहारी लाल और हर-हर महादेव का जयघोष गूंज उठा। अद्भुत पलों के दर्शन के लिए घाटों-छतों से गंगा में नावों-बजड़ों तक जनसैलाब उमड़ा था। आगे की स्लाइड्स में देखें....
विज्ञापन
2 of 6
nagnathaiya
- फोटो : अमर उजाला
कालिया नाग के फन पर बांसुरी बजाते कान्हा का दर्शन की अनूठी झांकी हर किसी को भावविह्वल कर गई। इन अलौकिक पलों को अपने कैमरों और मोबाइल में कैद करने की होड़ मची रही। अखाड़ा गोस्वामी तुलसीघाट की ओर से ‘नाग नथैया’ के आयोजन की परंपरा साढ़े चार सौ साल से अधिक पुरानी है। काशी के लक्खा मेलों में शुमार नाग नथैया देखने के लिए दोपहर बाद से ही भीड़ जुटने लगी थी।
विज्ञापन
3 of 6
varanasi
- फोटो : अमर उजाला
शाम चार बजे तक अस्सी से लेकर तुलसीघाट, रीवाघाट भदैनी तक हुजूम उमड़ पड़ा था। लीला की एक झलक देखने के लिए घाट से लेकर छतों तक कहीं भी कदम रखने की जगह नहीं थी। करीब सवा चार बजे कान्हा ने गेंद गंगा में फेंकी। सखाओं के मना करने के बाद भी जिद पर अड़े कन्हैया कदम की डाल पर चढ़ गए और गेंद निकालने के लिए नदी में छलांग लगा दी। फिर कुछ देर श्रद्धालुओं और दर्शनार्थियों की सांसें थम गईं।
4 of 6
varanasi
- फोटो : अमर उजाला
कुछ देर बाद कालिया नाग के फन पर विराजमान भगवान कृष्ण बंशी बजाते बाहर आए तो जय-जयकार गूंज उठी। हर-हर महादेव की गूंज, डमरू की गड़गड़ाहट, आरती और भजन से पूरा वातावरण भक्तिमय हो गया। कान्हा ने नदी की धारा में पूरा एक चक्कर लगाकर वहां मौजूद जनसैलाब को दर्शन दिया। बटुकाें ने आरती उतारी। सभी ने उनके चरणों में शीश नवाया और दर्शन कर धन्य हुए।
विज्ञापन
5 of 6
varanasi
- फोटो : अमर उजाला
इसके बाद इस कृष्ण लीला के आयोजक संकट मोचन मंदिर के महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने भगवान का माल्यार्पण किया। इस दौरान लीला देखने पहुंचे काशी नरेश राज परिवार के अनंत नारायण सिंह का भी माल्यार्पण कर स्वागत किया गया।
इस लीला में कृष्ण का पाठ हर्ष दुबे, कूदने वाले श्रीकृष्ण श्रेयांश शर्मा, बलदाऊ दिव्यम पाठक, राधा आशुतोष त्रिवेदी, सुदामा सतीश शर्मा, व्यास के रूप में श्याम नारायण पांडेय रहे। वहीं दुर्गा मंदिर महंत परिवार के विकास दुबे ने देव स्वरूप को कंधे पर बिठा कर ऊपर आरती स्थल तक पहुंचाया।