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सावन विशेष : जब शिवलिंग के स्पर्श मात्र से राजा को मिली कुष्ठ रोग से मुक्ति

Mon, 20 Aug 2018 04:57 PM IST
न्यूज डेस्क, अमर उजाला,मऊ
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shiv mandir in mau - फोटो : अमर उजाला

यूपी के मऊ जिले में एक ऐसा शिव मंदिर है जहां हर साल सावन मास में भक्तों की भीड़ लगी रहती है। ऐसी मान्यता है कि यहां आने वाले भक्तों की मनोकामना पूर्ण होती है। आगे की स्लाइड में पढ़ें इस प्राचीन मंदिर की पूरी कहानी...

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shiv mandir in mau - फोटो : अमर उजाला

मऊ के कोपागंज कस्बे में राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थापित प्राचीन गौरीशंकर मंदिर अपने गर्भ में कई किवदंतियां समेटे हुए है। मध्य प्रदेश के खोड़िया स्टेट के राजा पिथौरा कुष्ठ रोग से ग्रसित थे। परिवार में सिर्फ दो सदस्य एक राजा और उसकी पत्नी विष्णुप्रिया थी। राजा ने कुष्ठ रोग से निजात पाने के लिए तमाम इलाज करवाया लेकिन कोई लाभ नहीं मिला।

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shiv mandir in mau - फोटो : अमर उजाला

एक दिन राजा बाहर घूमने के लिए निकले। रास्ते में एक साधु की नजर राजा पर पड़ी। राजा को दुखी देख साधु ने बताया कि महाराज आप नेपाल स्थित पशुपति भगवान शिव के मंदिर का भभूति शरीर पर लगाएं तो आपका कुष्ठ रोग ठीक हो जाएगा। राजा दूसरे दिन अपने दल-बल के साथ नेपाल स्थित भगवान पशुपति नाथ मंदिर पर जाने के लिए प्रस्थान कर दिए।

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shiv mandir in mau - फोटो : अमर उजाला

कई दिनों तक सफर करने के पश्चात राजा कोपागंज पहुंचे। यहां शाम होते ही राजा ने रात्रि विश्राम करने का निर्णय लिया। उस समय कोपागंज पूरी तरह से जंगल था। राजा पिथौरा ने आबादी न देख वर्तमान में बने मंदिर के दक्षिण तरफ अपना शिविर लगाया। जब शाम हुई तो राजा ने नित्यक्रिया से निपटने के लिए जंगल में गए और वहां स्थित छोटे गड्ढे के पास पहुंचे।

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शिवरात्री - फोटो : self

राजा ने जैसे ही गड्ढे में हाथ डाला तो देखा कि राजा का पूरा हाथ जो कुष्ठ रोग से ग्रसित था, वह ठीक हो गया। आश्चर्यचकित राजा ने बिना देर किए स्नान किया और उनके शरीर का कोढ़ समाप्त हो गया। राजा ने सहयोगी को अपने पास पहुंचकर अपने मंत्री से पूरी घटना बताई। यह सुन सभी गड्ढे की खुदाई करने लगे। थोड़ी ही देर बाद एक शिवलिंग दिखायी दिया।

 

 

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lord shiva symol image
राजा ने शिवलिंग निकलवाने का काफी प्रयास किया। लेकिन सफलता नहीं मिल सकी। अंत में हार मानकर राजा ने मंदिर की स्थापना करने का निर्णय लिया। राजा ने लाव-लश्कर के साथ राज्य को प्रस्थान कर गए। कुछ दिनों के पश्चात राजा पुन: कोपागंज आए और उसी गड्ढे के ऊपर स्थापित है मंदिर का भव्य निर्माण संवत 1529 में कराया। मंदिर के प्रवेश द्वार पर फारसी भाषा में संवत 1529 और राजा पिथौरा का नाम टूटेफूटे अक्षरों में आज भी अंकित नजर आता है।
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