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लमही में सजी प्रेमचंद की विरासत: ईदगाह से कफन तक...मंचित हुईं कालजयी रचनाएं, भावपूर्ण मंचन; मुग्ध हुए लोग

Sat, 01 Aug 2026 09:08 PM IST
Aman Vishwakarma अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: वाराणसी के लमही स्थित प्रेमचंद स्मारक पर 146वीं जयंती के अवसर पर साहित्यिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित हुए। इस दौरान ईदगाह, कफन समेत प्रेमचंद की कालजयी रचनाओं का मंचन किया गया। डीएम ने स्मारक पर श्रद्धासुमन अर्पित किए। बड़ी संख्या में साहित्य प्रेमी और स्थानीय लोग कार्यक्रम में शामिल हुए।
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प्रेमचंद के सवा सेर गेहूं नाटक का मंचन करते कलाकार। - फोटो : संवाद
Premchand Jayanti: उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती पर उनके पैतृक गांव लमही में संस्कृति विभाग और जिला प्रशासन के संयुक्त तत्वावधान में लमही महोत्सव का आयोजन हुआ। इस दौरान साहित्य, लोकसंस्कृति और रंगमंच के माध्यम से प्रेमचंद की रचनाओं को जीवंत किया गया। एमएलसी धर्मेंद्र राय और जिलाधिकारी सत्येंद्र कुमार ने स्मारक पर पुष्पांजलि अर्पित कर उनके साहित्यिक योगदान को याद किया।



एमएलसी धर्मेंद्र राय ने कहा कि प्रेमचंद ने अपने साहित्य में किसानों, मजदूरों, महिलाओं, सामाजिक विषमता और शोषण जैसे विषयों को प्रमुखता दी। उनकी रचनाएं आज भी समाज को सोचने और बदलाव की प्रेरणा देती हैं। डीएम सत्येंद्र कुमार ने कहा कि बचपन में लगभग हर छात्र ने ईदगाह पढ़ी है और हामिद व उसकी दादी का भावनात्मक रिश्ता आज भी लोगों को संवेदनशील बनाता है। 
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नाट्य मंचन करते कलाकार। - फोटो : संवाद
उन्होंने कफन सहित अन्य रचनाओं का उल्लेख करते हुए कहा कि प्रेमचंद का साहित्य आने वाली पीढ़ियों के लिए अमूल्य धरोहर है। उन्होंने कहा कि बीएचयू के सहयोग से लमही स्थित संग्रहालय और अन्य सुविधाओं के विकास का प्रयास किया जाएगा, ताकि अधिक से अधिक लोग प्रेमचंद के साहित्य से परिचित हो सकें। महोत्सव में प्रेमचंद की चर्चित कहानियों और नाटकों की मंचीय प्रस्तुतियों ने दर्शकों की खूब सराहना बटोरी। पागल हाथी का कहानी-पाठ, बड़े घर की बेटी, कफन, ईदगाह, पंच परमेश्वर और मंत्र आदि कहानियों को कलाकारों ने अपने भावपूर्ण अभिनय से मंच पर जीवंत किया। 
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कार्यक्रम को संबोधित करते डीएम सत्येंद्र कुमार। - फोटो : संवाद
लोकसंगीत और निर्गुण गायन ने भी माहौल को साहित्यिक रंग दे दिया। प्रयागराज के विवेक विशाल का निर्गुण गायन, श्याम सुंदर पाल बिरहा गायन, महेंद्र सिंह यादव का कजरी, प्रेमचंद मार्गदर्शन की केंद्र पागल हाथी कहानी का पाठ हुआ। शाम को प्रेमचंद स्मारक व पैतृक आवास को दीपों से सजाया गया। क्षेत्रीय सांस्कृतिक केंद्र के प्रभारी डॉ. राम नरेश पाल ने स्वागत किया। 

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नाट्य मंचन देख जमकर बजीं तालियां। - फोटो : संवाद
महान कथाकार मुंशी प्रेमचंद जी को उनकी जन्म-जयंती पर आदरपूर्ण श्रद्धांजलि। अपनी कालजयी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने मानवीय संवेदनाओं को ऐसी सशक्त अभिव्यक्ति दी, जो आज भी प्रासंगिक है। अपनी जन्मभूमि और कर्मभूमि काशी की साहित्यिक विरासत को विश्व पटल पर पहचान दिलाने में भी उनका अमूल्य योगदान रहा है। यथार्थ और सामाजिक समानता पर आधारित उनका अमर साहित्य देशवासियों के लिए सदैव प्रेरणा का स्रोत बना रहेगा। -प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, एक्स
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उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की 146वीं जयंती पर नाट्य मचन। - फोटो : संवाद
आज के सामाजिक बदलाव में प्रेमचंद का विशिष्ट योगदान : कुलपति
बीएचयू कला संकाय से संचालित मुंशी प्रेमचंद स्मारक एवं शोध संस्थान लमही में शुक्रवार को तीन दिवसीय  प्रेमचंद जयंती समारोह-2026 का शुभारंभ हुआ। प्रेमचंदः मेरे लिए विषय पर परिसंवाद की अध्यक्षता बीएचयू के कुलपति प्रो. अजित कुमार चतुर्वेदी ने की। उन्होंने कहा कि आज हम जिस समाज में जी रहे हैं, वहां तक का सफर तय करने में प्रेमचंद की लेखनी का अतुलनीय योगदान है। प्रेमचंद ने सामाजिक रुढि़यों का विरोध किया और अपने जीवन व साहित्य के माध्यम से समाज में परिवर्तन लाने का प्रयास किया। प्रख्यात आलोचक, दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रो. आशुतोष कुमार, अखिलेश, प्रो. अरुण कमल, प्रो. सुषमा घिल्डियाल, प्रो. अनुराग दवे ने विचार रखे। 
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मंचित हुईं कालजयी रचनाएं। - फोटो : संवाद
इनकी रहीं प्रस्तुतियां
इप्टा (उरई), मंचदूतम संस्था ने सवासेर गेहूं, एचएस एकेडमी चोलापुर ने बूढ़ी काकी, संगत महाविद्यालय ने ठाकुर का कुआं, सेठ एमआर जैपुरिया बाबतपुर जैसी करनी वैसी भरनी, प्रेरणा कला मंच ने कफन, यर्थाथ क्रिएशन सोसाइटी ने बड़े घर की बेटी, नवरचना कॉन्वेंट स्कूल ने ईदगाह, संत अतुलानंद ने पंच परमेश्वर, संत अतुलानंद गिलट बाजार ने मंत्र की प्रस्तुति की। प्रमोद विश्वकर्मा ने कठपुतली और सेतु सांस्कृतिक केंद्र व इप्टा के कलाकारों ने घासवाली नाटा का मंचन किया। 

पांच साहित्यकारों का हुआ सम्म्मान: महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के डॉ. अविनाश सिंह, प्रो. उमेश प्रताप सिंह (तिब्बती विश्वविद्यालय), डॉ. अनुराग त्रिपाठी (विभागाध्यक्ष हिंदी विभाग, तिब्बती विश्वविद्यालय), संतोष कुमार, अमित कुमार द्विवेदी (संग्रहालयाध्यक्ष, लालबहादुर शास्त्री स्मृति भवन संग्रहालय रामनगर) का सम्मान हुआ। 
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लमही महोत्सव का आयोजन हुआ। - फोटो : संवाद
नवाब, बम्बूक, आफ्शान कुहन...धनपत राय से बने प्रेमचंद
नवाब, मुंशी, आफ्शान कुहन...बम्बूक। ये नाम कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद के हैं। उनके जीवन के विभिन्न पडावों पर उनको यह नाम मिलता गया। घरवालों में भाई से लेकर उनके दोस्तों और उनके कर्तव्य स्थल से भी अलग नाम दिए गए। तब जाकर आमजन के बीच मुंशी प्रेमचंद रूप में रच-बस गए। आमजन के दर्द और उनकी सामाजिक पीड़ा को कहानियों में समेटा। समाज के हर वर्ग की समस्याओं आमलोगों तक पहुंचाया।

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महोत्सव में नाट्य मंचन करतीं युवतियां। - फोटो : संवाद
मुुंशी प्रेमचंद के नवाबी अंदाज के चलते उनके भाई महताब राय ने उनको बचपन में नवाब कहकर पुकारे, फिर घर में ये चर्चित रहा। मुंशी प्रेमचंद स्मारक स्थल के संरक्षक सुरेशचंद दूबे ने बताया कि प्रेमचंद के दोस्तों ने उनके हास्य-व्यंग्य के आंदाज को देखते हुए उनके बम्बूक पुकारते थे। कहानी लेखन की शुरुआती दौर में उन्होंने हिंदी के बजाय उर्दू में लिखना शुरू किया। तमाम रचनाएं उन्होंने उर्दू में लिखे। इसके चलते उनको लोग आफ्शान कुहन नाम दिया। 
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लमही महोत्सव में गणमान्य लोग। - फोटो : संवाद
उन्होंने बताया कि जब वह जमाना पत्रिका में काम करते थे तक वहां के संपादक मुंशी दयानारायण निगम ने उनका नाम प्रेमचंद रखा। इसके बाद प्रेमचंद जी हंस पत्रिका खुद चलाना शुरू किया। जब इस पत्रिका का संचालन के लिए आर्थिक तंगी आई तो उन्होंने कन्हैयालाल मानिक लाल मुंशी को हिस्सेदार बना लिया। पत्रिका में दोनों लोगों का नाम लिखने में लंबा हो जाता था। इसको देखते हुए मुंशी प्रेमचंद रखा गया। यही नाम उनका अमर हो गया। हालांकि उनके पिता ने उनका नाम धनपत राय श्रीवास्तव रखा था, जो उनके प्रमाण पत्रों में दर्ज है।
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