पितृ पक्ष आज से शुरू हो चुका है। पितृ पक्ष के दौरान दिवंगत पूर्वजों की आत्मा की शांति के लिए श्राद्ध किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि पितृ पक्ष में पूर्वज पृथ्वी पर सूक्ष्म रूप के रूप में आते हैं और पृथ्वी लोक पर जीवित रहने वाले अपने परिजनों के तर्पण को स्वीकार करते हैं। मान्यता के अनुसार इस पर्व में गया के अलावा काशी में भी पितरों के मोक्ष के लिए दूर दराज से आने वाले श्रद्धालु कुंड पर पिंडदान करते हैं। पितृपक्ष में सभी मांगलिक कार्य बंद रहते हैं। पितरों को तृप्त करना और उनकी आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में श्राद्ध करना जरूरी माना जाता है। आगे की स्लाइड्स में देखें.....
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काशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री आचार्य ऋषि द्विवेदी ने बताया कि दैहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों से मुक्ति पाने के लिए श्राद्ध से बढ़कर कोई दूसरा उपाय नहीं है। सूर्यपुत्र यमदेव के बीस हज़ार वर्ष तक घोर तपस्या करने के बाद भगवान शिव ने उन्हें यमलोक और पितृलोक का अधिकारी बनाया। जो लोग गया पिंडदान करने जाते हैं, वह मोक्ष की नगरी काशी में भी पितरों के लिए पिंडदान करते हैं।
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धर्मकूप, मणिकर्णिका और दशाश्वमेध पर तर्पण-अर्पण और पिंडदान के लिए उमड़ेंगे वंशज
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काशी विद्वत परिषद के संगठन मंत्री पं. दीपक मालवीय के अनुसार वैसे तो किसी भी माह की जिस तिथि में परिजन की मृत्यु हुई हो, उसी तिथि में श्राद्ध करना चाहिए। इसके बाद भी कुछ ख़ास तिथियां भी हैं, जिनमे अलग-अलग तरह से मृत्यु होने वाले परिजन का श्राद्ध कर्म किया जाता है। इसमें नवमी तिथि को सौभाग्यवती महिला का। जहर, हत्या, दुर्घटना वाले लोगों का एकादशी के दिन, वहीं सर्पदंश, वज्रघात, जले, पशु से आक्रमण, फांसी लगाकर मृत्य, क्षय जैसे महारोग हैजा, डाकुओं के मारे जाने से हुई मृत्यु वाले लोगों का चतुर्दशी और अमावस्या के दिन तर्पण किया जाना चाहिए।
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पितृपक्ष में पितरों के अह्वान पर घर आ जाते हैं। ऐसे में जब ब्राह्मणों को भोजन कराया जाता है तो वे ब्राह्मणों के साथ ही भोजन करते हैं। भोजन से तृप्त होने के बाद पितर अपने परिवार के लोगों को आशीर्वाद देकर वापस स्वर्ग लोक चले जाते हैं। श्राद्ध में ब्राह्मण भोज का सबसे अच्छा समय दोपहर 11 बजकर 36 मिनट से लेकर 12 बजकर 24 मिनट तक के बीच का माना गया है। इस दौरान श्राद्ध तर्पण और ब्राह्मण भोजन सबसे अधिक फलदायी होता है।
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कर्मकांड के जानकार पंडित कामता प्रसाद पांडेय का कहना है कि श्राद्ध का मतलब श्रद्धा पूर्वक अपने पितरों को अर्पण करना है। हिंदू शास्त्रों के अनुसार जिस किसी के परिजन अपने शरीर को छोड़कर चले गए हैं, उनकी तृप्ति के लिए श्रद्धा के साथ जो शुभ संकल्प और तर्पण किया जाता है, उसे श्राद्ध कहा जाता है।
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ऐसी मान्यता है कि मृत्यु के बाद देवता, यमराज श्राद्ध पक्ष में जीव को मुक्त कर देते हैं, ताकि वह स्वजनों के यहां जाकर तर्पण ग्रहण कर सकें। हिंदू धर्म में पितृ पक्ष का विशेष महत्व होता है। पितृपक्ष के 15 दिन पितरों को समर्पित होता है। शास्त्रों अनुसार श्राद्ध पक्ष भाद्रपक्ष की पूर्णिणा से आरम्भ होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलता हैं। जब श्राद्ध की तिथि याद न हो तो पितृपक्ष में पूर्वजों का स्मरण और उनकी पूजा करने से उनकी आत्मा को शांति मिलती है।
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- फोटो : pitru paksha 2018
श्राद्ध पक्ष में कौवा, कुत्ता और गाय का बहुत ही महत्व है। श्राद्ध में कौवों को श्रद्धा का प्रतीक माना गया है। हालांकि इस समय कौवों की संख्या नाम मात्र है। इस माह में जब भी पितरों की पूजा करते हैं तो भोजन करने से पूर्व कौवा, कुत्ता और गाय को भोजन खिलाते हैं।
शास्त्रों के अनुसार यदि किसी को अपने पितरों के देहावसान की तिथि मालूम नहीं है तो ऐसी स्थिति में आश्विन अमावस्या को तर्पण किया जा सकता है। इस लिए इस अमावस्या को सर्वपितृ अमावस्या कहा जाता है। इसके अलावा यदि किसी की अकाल मृत्यु हुई हो तो उनका श्राद्ध चतुर्दशी तिथि को किया जाता है।