राष्ट्रीय खेल दिवस पर काशी के उन खिलाड़ियों को याद किया जा रहा है, जिन्होंने ओलंपिक जैसे बड़े मंच पर देश का नाम रोशन किया। बनारस की मिट्टी ने हॉकी, कुश्ती, एथलेटिक्स समेत विभिन्न खेलों में प्रतिभाएं दी हैं। इन खिलाड़ियों की उपलब्धियों ने न केवल भारत का गौरव बढ़ाया, बल्कि दुनिया में काशी की खेल पहचान भी मजबूत की।
काशी केवल मंदिरों, घाटों और संस्कृति की नगरी नहीं है। यह खेल प्रतिभाओं की भी ऐसी धरती रही है, जहां अखाड़ों की मिट्टी से लेकर हॉकी के मैदान और दौड़ की पटरियों तक, खिलाड़ियों ने अपने सपनों को आकार दिया। सीमित साधनों, कठिन परिस्थितियों और लगातार मेहनत के बीच काशी के कई खिलाड़ियों ने देश की जर्सी पहनकर ओलंपिक जैसे सबसे बड़े खेल मंच तक सफर किया। इन खिलाड़ियों की कहानियां केवल पदक जीतने या प्रतियोगिता में हिस्सा लेने की कहानियां नहीं हैं।
इनमें किसी के लिए अखाड़े की मिट्टी रास्ता बनी, किसी ने पानी में अपनी पहचान बनाई, तो किसी ने लंबी दौड़, तीरंदाजी, लंबी कूद और भाला फेंक जैसी अलग-अलग स्पर्धाओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया। मोहम्मद शाहिद का स्वर्णिम दौर हो या ललित उपाध्याय के लगातार दो ओलंपिक पदक, इन उपलब्धियों के पीछे वर्षों का अनुशासन, त्याग और संघर्ष छिपा है। इन 12 ओलंपियनों की यात्रा मिलकर काशी के खेल इतिहास की एक ऐसी तस्वीर सामने रखती है, जिसमें पुरानी परंपरा और नई उम्मीद साथ-साथ दिखाई देती है।
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अनंत राम भार्गव।
- फोटो : अमर उजाला
अनंत राम भार्गव : जब काशी ने पहली बार ओलंपिक देखा...
अनंत राम भार्गव का नाम काशी के शुरुआती ओलंपिक इतिहास से जुड़ा है। वाराणसी के गायघाट मोहल्ले में जन्मे भार्गव ने 1948 के लंदन ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। यह वह समय था जब देश को स्वतंत्र हुए बहुत कम समय हुए थे और खिलाड़ियों के पास आज जैसी सुविधाएं नहीं थीं। भारतीय कुश्ती की तैयारी मुख्य रूप से अखाड़ों में होती थी। मिट्टी की कुश्ती, पारंपरिक दांव-पेच और कठिन शारीरिक अभ्यास ही पहलवानों की ताकत थे। ऐसे माहौल से निकलकर अंतरराष्ट्रीय खेल मंच तक पहुंचना बड़ी उपलब्धि थी।
अनंत राम भार्गव की उपलब्धि का महत्व किसी पदक से कहीं आगे है। उन्होंने काशी के खिलाड़ियों के लिए ओलंपिक का रास्ता खोला। उनके बाद वाराणसी से कुश्ती, हॉकी, तीरंदाजी और दौड़ जैसे कई खेलों में खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंचे। उनकी कहानी काशी के उस खेल सफर की शुरुआत है, जो आज भी लगातार आगे बढ़ रहा है।
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सचिन नाग।
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सचिन नाग : लहरों पर लिखा भारत का नाम
वाराणसी में जन्मे सचिन नाग भारत के शुरुआती तैराकों और वाटरपोलो खिलाड़ियों में शामिल थे। उनका ओलंपिक सफर 1948 के लंदन खेलों से शुरू हुआ। उन्होंने 100 मीटर तैराकी में हिस्सा लिया और 34वां स्थान प्राप्त किया। इसी खेल आयोजन में वे भारतीय वाटरपोलो दल का भी हिस्सा रहे। 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में भी उन्होंने वाटरपोलो में भारत का प्रतिनिधित्व किया। इससे पहले 1951 के दिल्ली एशियाई खेलों में उनका प्रदर्शन शानदार रहा था।
उन्होंने 100 मीटर तैराकी में स्वर्ण पदक जीता और दो अन्य स्पर्धाओं में कांस्य पदक हासिल किए। सचिन नाग का महत्व इसलिए भी बड़ा है क्योंकि उन्होंने उस समय भारत का प्रतिनिधित्व किया जब देश में तैराकी के लिए आधुनिक सुविधाएं बहुत सीमित थीं। उनकी उपलब्धियां बताती हैं कि काशी की खेल प्रतिभा केवल कुश्ती और हॉकी तक सीमित नहीं थी। पानी के खेलों में भी बनारस ने देश को अंतरराष्ट्रीय स्तर का खिलाड़ी दिया।
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गुलजारा सिंह।
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गुलजारा सिंह : काशी की रफ्तार पहुंची हेलसिंकी
गुलजारा सिंह का नाम वाराणसी के उन शुरुआती खिलाड़ियों में आता है जिन्होंने एथलेटिक्स में भारत का प्रतिनिधित्व किया। वाराणसी में चितईपुर से जुड़े गुलजारा सिंह ने 1952 के हेलसिंकी ओलंपिक में हिस्सा लिया। उस समय भारतीय खेल जगत में आधुनिक प्रशिक्षण सुविधाएं बहुत कम थीं। खिलाड़ियों को सीमित संसाधनों के बीच अभ्यास करना पड़ता था। लंबी दूरी की दौड़ जैसे खेलों में शारीरिक क्षमता के साथ अनुशासन और निरंतर अभ्यास की बड़ी भूमिका होती थी।
हेलसिंकी तक पहुंचना गुलजारा सिंह के लिए केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं थी। यह काशी की खेल प्रतिभा के लिए एक नई दिशा भी थी। उस दौर में अधिकांश लोग कुश्ती और हॉकी को ही भारतीय खेलों की पहचान मानते थे, लेकिन गुलजारा सिंह ने दौड़ के मैदान में भी बनारस का नाम पहुंचाया। उनकी कहानी उस पीढ़ी की कहानी है जिसने आधुनिक खेल सुविधाओं के अभाव के बावजूद बड़े सपने देखे। उन्होंने आने वाली पीढ़ी को यह भरोसा दिया कि काशी का खिलाड़ी भी दुनिया के सबसे बड़े खेल मंच तक पहुंच सकता है।
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लक्ष्मीकांत पांडेय।
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लक्ष्मीकांत पांडेय : अखाड़े की मिटटी से मेलबर्न तक
लक्ष्मीकांत पांडेय, जिन्हें चिक्कन पांडेय के नाम से भी जाना जाता है, काशी की पारंपरिक कुश्ती से जुड़े प्रमुख खिलाड़ियों में रहे। कोइरीपुर खुर्द में जन्मे पांडेय ने 1956 के मेलबर्न ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उनके समय में कुश्ती की तैयारी आज की तरह आधुनिक साधनों पर निर्भर नहीं थी। अखाड़े की मिट्टी, कठिन व्यायाम, शारीरिक ताकत और गुरु से मिले दांव-पेच ही पहलवान की असली पूंजी होते थे।
मेलबर्न तक पहुंचना इस बात का प्रमाण था कि स्थानीय अखाड़ों में तैयार होने वाला खिलाड़ी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व कर सकता है। काशी की कुश्ती परंपरा को दुनिया तक पहुंचाने वाली शुरुआती पीढ़ी में उनका नाम महत्वपूर्ण है। लक्ष्मीकांत पांडेय की कहानी पदक की नहीं, बल्कि उस दौर की है जब भारतीय पहलवान सीमित साधनों के बावजूद विश्वस्तरीय प्रतियोगिता तक पहुंचने का प्रयास कर रहे थे। उनकी उपलब्धि ने काशी की अखाड़ा संस्कृति को राष्ट्रीय खेल पहचान से जोड़ने में योगदान दिया।
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मोहम्मद शाहिद।
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मोहम्मद शाहिद : हॉकी की कलाकारी का काशी सितारा
मोहम्मद शाहिद काशी के सबसे प्रसिद्ध ओलंपिक खिलाड़ियों में गिने जाते हैं। वाराणसी में जन्मे शाहिद भारतीय हॉकी में अपनी तेज रफ्तार और गेंद पर शानदार नियंत्रण के लिए प्रसिद्ध हुए। उन्होंने 1980, 1984 और 1988 के ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व किया। 1980 के मास्को ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम ने स्वर्ण पदक जीता और शाहिद उस विजेता दल का हिस्सा थे। यह उनकी सबसे बड़ी ओलंपिक उपलब्धि रही। उन्होंने एशियाई खेलों में भी भारत को पदक दिलाए। 1982 में रजत और 1986 में कांस्य पदक उनके खाते में रहा।
भारतीय हॉकी में उनके योगदान के लिए उन्हें अर्जुन पुरस्कार और पद्मश्री से सम्मानित किया गया। शाहिद की खासियत केवल उनकी गति नहीं थी। वे गेंद को विरोधी खिलाड़ियों के बीच से निकालने और अचानक आक्रमण करने के लिए जाने जाते थे। उनका निधन 2016 में हुआ, लेकिन भारतीय हॉकी में उनकी पहचान आज भी कायम है। काशी के लिए वे उस पीढ़ी के सबसे चमकदार सितारों में हैं जिसने भारतीय हॉकी को फिर से गौरव दिलाया।
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विवेक सिंह।
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विवेक सिंह : कठिन दौर में थामी हॉकी की कमान
विवेक सिंह ने 1988 के सियोल ओलंपिक में भारतीय पुरुष हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व किया। उनका जन्म वाराणसी में हुआ था और वे भारतीय रेलवे से जुड़े रहे। उनका ओलंपिक सफर भारतीय हॉकी के बदलाव के दौर में आया। भारत का कभी हॉकी पर दबदबा था, लेकिन उस समय यूरोप और दूसरे देशों की टीमें तेजी से मजबूत हो रही थीं। ऐसे दौर में राष्ट्रीय टीम में जगह बनाना बड़ी उपलब्धि थी। सियोल ओलंपिक में भारतीय टीम छठे स्थान पर रही। विवेक सिंह ने इसके बाद भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना सफर जारी रखा।
1990 के बीजिंग एशियाई खेलों में भारतीय टीम ने रजत पदक जीता और वे उस दल का हिस्सा रहे। उनका जीवन बहुत लंबा नहीं रहा। 2007 में वाराणसी में उनका निधन हो गया। उस समय उनकी आयु केवल 39 वर्ष थी। विवेक सिंह की कहानी बताती है कि किसी खिलाड़ी की महानता केवल पदक से तय नहीं होती। देश की जर्सी पहनकर ओलंपिक मैदान तक पहुंचना भी अपने आप में गौरव की बात है।
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संजीव सिंह।
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संजीव सिंह : जब काशी का निशाना ओलंपिक तक पहुंचा
वाराणसी के दारानगर मोहल्ले से जुड़े रहे संजीव सिंह ने 1988 के सियोल ओलंपिक में तीरंदाजी में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उस समय भारत में तीरंदाजी आज जितनी लोकप्रिय नहीं थी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभव और सुविधाएं भी सीमित थीं। सियोल में संजीव सिंह ने व्यक्तिगत तीरंदाजी स्पर्धा में 36वां स्थान हासिल किया। भारतीय दल ने टीम स्पर्धा में 20वां स्थान प्राप्त किया। उनकी उपलब्धि का महत्व इस बात में है कि उन्होंने उस समय भारत को तीरंदाजी में प्रतिनिधित्व दिया, जब यह खेल देश में अपनी पहचान बना ही रहा था।
आज भारतीय तीरंदाज विश्व स्तर पर पदक जीतते हैं। लेकिन इस सफलता के पीछे उन शुरुआती खिलाड़ियों का भी योगदान है जिन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भारत की उपस्थिति दर्ज कराई। संजीव सिंह की कहानी काशी की विविध खेल प्रतिभा को सामने लाती है। बनारस की पहचान केवल अखाड़ों और हॉकी मैदानों से नहीं बनी। यहां से निकले खिलाड़ियों ने निशाने वाले खेलों में भी देश का प्रतिनिधित्व किया। उनका ओलंपिक सफर आने वाली पीढ़ियों के लिए एक शुरुआती आधार बना।
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राहुल सिंह।
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राहुल सिंह : अटलांटा तक पहुंची काशी की हॉकी
वाराणसी में जन्मे राहुल सिंह ने 1996 के अटलांटा ओलंपिक में भारतीय हॉकी टीम का प्रतिनिधित्व किया। वे उस पीढ़ी के खिलाड़ी थे जिसने भारतीय हॉकी को बदलते अंतरराष्ट्रीय माहौल में संभाला। 1990 के दशक तक हॉकी में कई देशों की टीमें बहुत मजबूत हो चुकी थीं। यूरोप और ऑस्ट्रेलिया की टीमों ने भारतीय शैली को कड़ी चुनौती देना शुरू कर दिया था। ऐसे समय में राष्ट्रीय टीम में जगह बनाना कठिन था। राहुल सिंह का ओलंपिक चयन काशी की हॉकी परंपरा की निरंतरता का प्रमाण था।
उनसे पहले मोहम्मद शाहिद जैसे खिलाड़ी भारत को गौरव दिला चुके थे। राहुल ने उसी खेल परंपरा को आगे बढ़ाते हुए अटलांटा में देश की जर्सी पहनी। उनकी कहानी किसी पदक की बजाय उस दौर की है जब भारतीय हॉकी नई चुनौतियों के बीच अपनी जगह बनाए रखने के लिए संघर्ष कर रही थी। काशी के लिए उनका महत्व इसलिए भी है कि शहर से निकलने वाली हॉकी प्रतिभा एक पीढ़ी तक सीमित नहीं रही। अलग-अलग दौर में वाराणसी ने राष्ट्रीय टीम के लिए खिलाड़ी दिए। राहुल सिंह इसी निरंतरता की एक महत्वपूर्ण कड़ी हैं।
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संजय राय।
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संजय राय : सुसवाही से सिडनी तक एक लंबी छलांग
वाराणसी में सुसवाही मोहल्ले से जुड़े रहे संजय राय ने 2000 के सिडनी ओलंपिक में भारत का प्रतिनिधित्व लंबी कूद में किया। वे काशी के उन खिलाड़ियों में रहे जिन्होंने व्यक्तिगत खेल में देश का नाम अंतरराष्ट्रीय मंच तक पहुंचाया। लंबी कूद में केवल ताकत पर्याप्त नहीं होती। दौड़ की गति, छलांग लगाने का सही समय, शरीर का संतुलन और जमीन पर उतरने की तकनीक—इन सभी का सही तालमेल जरूरी होता है। ओलंपिक तक पहुंचना उनके लिए वर्षों की मेहनत का परिणाम था। उस समय भारत में एथलेटिक्स खिलाड़ियों के लिए आधुनिक सुविधाएं आज की तुलना में काफी कम थीं।
फिर भी उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाकर दुनिया की सबसे बड़ी खेल प्रतियोगिता में जगह बनाई। संजय राय की कहानी यह बताती है कि काशी की खेल प्रतिभा केवल सामूहिक खेलों तक सीमित नहीं रही। यहां के खिलाड़ियों ने अपने दम पर प्रदर्शन करने वाली स्पर्धाओं में भी देश का प्रतिनिधित्व किया। सिडनी ओलंपिक उनके जीवन का महत्वपूर्ण पड़ाव था। पदक भले नहीं आया, लेकिन भारत की ओर से ओलंपिक मैदान में उतरना अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी।
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राम सिंह यादव।
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राम सिंह यादव : 42 किलोमीटर की हिम्मत
वाराणसी में जन्मे राम सिंह यादव ने 2012 के लंदन ओलंपिक में मैराथन में भारत का प्रतिनिधित्व किया। उन्होंने प्रतियोगिता में 78वां स्थान हासिल किया। मैराथन दुनिया की सबसे कठिन दौड़ स्पर्धाओं में से एक मानी जाती है। 42.195 किलोमीटर की दूरी पूरी करने के लिए केवल गति नहीं, बल्कि असाधारण सहनशक्ति और मानसिक मजबूती चाहिए। राम सिंह भारतीय सेना से जुड़े रहे और पुणे स्थित सेना के खेल संस्थान में प्रशिक्षण लिया। 2012 में मुंबई मैराथन में उन्होंने 2 घंटे 16 मिनट 59 सेकंड का समय दर्ज किया और ओलंपिक के लिए निर्धारित मानक हासिल किया।
लंदन तक उनका पहुंचना उस मेहनत का परिणाम था जो वर्षों तक रोजाना की दौड़, अभ्यास और अनुशासन में बदलती रही। उनकी कहानी पदक से अधिक उस दूरी की कहानी है जिसे पूरा करने के लिए शरीर और मन दोनों को तैयार करना पड़ता है। ओलंपिक में दुनिया के सर्वश्रेष्ठ धावकों के साथ दौड़ना ही उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी। राम सिंह ने काशी की ओलंपिक कहानी में सहनशक्ति और लंबी दूरी की दौड़ का अध्याय जोड़ा।
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शिवपाल सिंह।
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शिवपाल सिंह : भाले की उड़ान टोक्यो तक
रामनगर से जुड़े शिवपाल सिंह भारत के प्रमुख भाला फेंक खिलाड़ियों में रहे। उन्होंने टोक्यो ओलंपिक के लिए भारतीय दल में जगह बनाई और काशी की खेल पहचान को मैदान की एक अलग स्पर्धा तक पहुंचाया। भाला फेंक में खिलाड़ी को दौड़ते हुए अपनी गति और ताकत को एक सही क्षण पर भाले में बदलना होता है। थोड़ी सी गलती दूरी को काफी प्रभावित कर सकती है। इसलिए इसमें शरीर की ताकत के साथ तकनीक और संतुलन भी जरूरी है।
शिवपाल ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में लगातार प्रदर्शन करते हुए भारतीय दल में जगह बनाई। उनका ओलंपिक चयन ऐसे समय हुआ जब भारत में भाला फेंक को लेकर लोगों की रुचि तेजी से बढ़ रही थी। उनका सफर यह भी दिखाता है कि काशी की नई पीढ़ी पारंपरिक खेलों से आगे बढ़कर आधुनिक खेल विधाओं में भी अपनी जगह बना रही है। वाराणसी की पहचान लंबे समय से कुश्ती और हॉकी से जुड़ी रही है। शिवपाल ने उसमें एथलेटिक्स की एक नई कड़ी जोड़ी। टोक्यो तक पहुंचना उनके लिए वर्षों के अभ्यास, प्रतियोगिताओं और कठिन परिश्रम का परिणाम था।
ललित उपाध्याय : काशी के नाम दो ओलंपिक कांस्य
वाराणसी के भगतपुर से जुड़े ललित उपाध्याय ने काशी की हॉकी परंपरा को आधुनिक दौर में नई ऊंचाई दी। वे भारतीय पुरुष हॉकी टीम के साथ टोक्यो 2020 और पेरिस 2024 ओलंपिक में खेले। दोनों खेल आयोजनों में भारतीय टीम ने कांस्य पदक जीता। इस तरह ललित लगातार दो ओलंपिक में पदक जीतने वाली भारतीय हॉकी टीम के सदस्य बने। ललित की पहचान तेज खेल, आक्रमण में सक्रियता और टीम के लिए लगातार मेहनत करने वाले खिलाड़ी के रूप में बनी।
राष्ट्रीय टीम तक पहुंचने से पहले उन्होंने जूनियर स्तर से लेकर घरेलू प्रतियोगिताओं तक लंबा सफर तय किया। टोक्यो में भारतीय हॉकी ने लंबे इंतजार के बाद ओलंपिक पदक हासिल किया। पेरिस में टीम ने फिर कांस्य पदक जीतकर इस सफलता को दोहराया। ललित की उपलब्धि काशी के लिए इसलिए खास है क्योंकि उनके साथ वाराणसी की हॉकी परंपरा नई पीढ़ी तक पहुंची। मोहम्मद शाहिद के स्वर्णिम दौर के कई दशक बाद ललित ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काशी का नाम फिर चमकाया। उनकी कहानी बताती है कि किसी शहर की खेल परंपरा तभी जीवित रहती है, जब नई पीढ़ी पुराने गौरव को आगे बढ़ाती है।