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मकर संक्रांति: रामनगर की रक्षा ने 15 पतंगें काटीं, इनमें 11 पतंगें लड़कों की; बनारस की छतों पर बदलती तस्वीर

Thu, 15 Jan 2026 06:51 AM IST
अमन विश्वकर्मा अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: मकर संक्रांति के अवसर पर गंगा किनारे से लेकर घर की छतों पर युवाओं ने पतंगबाजी की। लड़कियां भी पीछे नहीं रहीं। ग्रुप बनाकर वे भी युवकाें के पतंग काट रही थीं। छतों पर बड़े-बड़े डीजे से गाने भी बज रहे थे।
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मकर संक्रांति पर लड़कियों ने की पतंगबाजी। - फोटो : अमर उजाला
Makar Sankranti: मकर संक्रांति पर इस बार आसमान में सिर्फ पतंगे नहीं, बदली हुई सोच भी नजर आई। जिस खेल को बरसों तक पुरुषों का माना गया, उसी पतंगबाजी में लड़कियों और महिलाओं ने न सिर्फ खुलकर हिस्सा लिया बल्कि लड़कों की पतंगें भी काटी।
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रंग-बिरंगी पतंगों से सजा आसमान। - फोटो : अमर उजाला
काशी विद्यापीठ की बीए की छात्रा रक्षा राजपूत करीब एक हफ्ते से पतंग उड़ा रही हैं और अब तक 15 पतंगें काट चुकी हैं। इसमें 11 पतंगें लड़कों की थीं। रक्षा कहती हैं कि पहले लोगों की सोच अलग थी, लेकिन अब लोगों की सोच बदल गई है। पतंग उड़ाना, मांझा थामना और मुकाबले करना पुरुषों का काम माना जाता था। लेकिन, अब हम इसमें हिस्सा ले रहे हैं और इस बदलाव के गवाह हैं। हालांकि इस खेल में चुनौतियां भी हैं। 
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कन्ना छेदा...उड़ाई पतंग। - फोटो : अमर उजाला
चीनी मांझे का खतरा, बिजली के तार और काशी की तंग छतें। इन सबके बीच पतंग उड़ाना जोखिम भरा भी है। दस्ताने पहनना, सुरक्षित दूरी रखना और एक-दूसरे का ध्यान रखकर हम खूब पतंगबाजी कर रहे हैं।

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पतंगों से गुलजार रहे आसमान। - फोटो : अमर उजाला
मकर संक्रांति की दोपहर लंका इलाके में भी कुछ अलग थी। जेआरएफ की तैयारी कर रहीं निधि और बीएचयू की छात्रा सुरभि पूरे आत्मविश्वास के साथ पतंग उड़ाती नजर आईं। हवा का रुख बदलते ही दोनों डोर संभालती हैं, आंखें आसमान में और चेहरे पर मुस्कान। 
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युवाओं के साथ बच्चों ने भी उड़ाई पतंग। - फोटो : अमर उजाला
निधि कहती हैं कि ये सिर्फ खेल नहीं है। साल भर नियमों, पढ़ाई और जिम्मेदारियों में रहते हैं। इस एक दिन छत पर खड़े होकर लगता है कि हम भी खुलकर सांस ले सकते हैं। लंका निवासी सुरभि कहती हैं कि पहले लोग कहते थे कि लड़कियों को क्या जरूरत है पतंग उड़ाने की। अब वही लोग छत पर जगह बना देते हैं। 
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वाराणसी में पतंग प्रतियोगिता में युवाओं का जमावड़ा। - फोटो : अमर उजाला
यह छोटा बदलाव लगता है, लेकिन हमारे लिए बहुत बड़ा है। लंका और पुराने शहर के इलाकों में कई घरों की गृहणियां भी बच्चों के साथ पतंग उड़ाती दिखीं। कहीं महिलाएं खुद पतंग काटने की कोशिश कर रही थीं, तो कहीं छतों पर हंसी-ठहाकों के बीच दोस्ताना मुकाबले चल रहे थे। कई परिवारों में इस बार रोक-टोक कम और भरोसा ज्यादा नजर आया।
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दुकान पर रखी पतंग और चरखी।  - फोटो : संवाद
एक्टिविस्ट प्रतिभा सिंह कहती हैं कि मकर संक्रांति पर काशी की छतों का ये नजारा बताता है कि बदलाव हमेशा बड़े आंदोलनों या नारों से नहीं आता। कभी-कभी वह एक पतंग की डोर से शुरू होता है। जब काशी की लड़कियां और महिलाएं छत पर खड़ी होकर पतंग उड़ाती हैं तो वे परंपरा से टकराती नहीं और उसे नई दिशा देती हैं।

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